जय हरन धरनी भार
जय हरन धरनी भार
छन्द ३, दोहा ११३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार॥ जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल॥ ३ ॥
अर्थ
हे धरती का भार हरनेवाले! हे अपार उदार महिमावाले! आपकी जय हो। हे रावण के शत्रु! हे कृपालु! आपकी जय हो। आपने राक्षसों को बेहाल (तहस-नहस) कर दिया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द ३, दोहा ११३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा