कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव
कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव
छन्द ७, दोहा ११३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव॥ मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप॥ ७ ॥
अर्थ
कोई उन निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करते हैं जिन्हें वेद अव्यक्त (निराकार) कहते हैं। परन्तु हे रामजी ! मुझे तो आपका यह सगुण कोसलराज-स्वरूप ही प्रिय लगता है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द ७, दोहा ११३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा