नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार
नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार
दोहा ११५ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार। कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥ ११५ ॥
अर्थ
हे नाथ! जब अयोध्यापुरी में आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर ! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का दोहा ११५ है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा