रावण का विभीषण पर शक्ति छोड़ना, रामजी का शक्ति को अपने ऊपर लेना, विभीषण-रावण युद्ध

रावण विभीषण पर शक्ति चलाता है, पर रामजी उसे अपने ऊपर ले लेते हैं। भक्त-रक्षा की यह लीला देख विभीषण पुनः युद्ध में प्रवृत्त होते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २५ / ३७

प्रकरण पाठ

दोहा

पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड। चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥ ९३ ॥

अर्थ:

फिर रावण ने क्रोधित हो प्रचण्ड शक्ति छोड़ी। वह विभीषण के सामने ऐसी चली जैसे काल (यमराज) का दण्ड हो॥

दोहा 94 के अंतर्गत
चौपाई

आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा॥ तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥ १ ॥

अर्थ:

अत्यन्त भयानक शक्ति को आती देख और यह विचारकर कि मेरा प्रण शरणागत के दुःख का भंजन करना है, श्रीरामजी ने तुरंत विभीषण को पीछे कर दिया और सामने होकर वह शक्ति स्वयं सह ली।

चौपाई

लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई॥ देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो॥ २ ॥

अर्थ:

शक्ति लगने से उन्हें कुछ मूर्च्छा हो गयी। प्रभु ने यह लीला की, पर देवताओं को व्याकुलता हुई। प्रभु को श्रम प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथ में गदा लेकर दौड़े।

चौपाई

रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे॥ सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए॥ ३ ॥

अर्थ:

[और बोले--] रे कुभाग्य, सठ, मंद, कुबुद्धि! तैं सुर, नर, मुनि, नाग विरुद्धे॥ सादर शिव को सीस चढ़ाए। एक-एक के करोड़ों पाए॥

चौपाई

तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो॥ राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा॥ ४ ॥

अर्थ:

उसी कारण से अरे दुष्ट! तू अब तक बचा है। [किन्तु] अब तेरे सिर पर काल नाच रहा है। राम विमुख, सठ! तू सम्पदा चाहता है? ऐसा कहकर विभीषण ने रावण की छाती के बीचो-बीच गदा मारी।

छन्द

उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्‌यो। दस बदन सोनित स्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर्‌यो॥ द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै। रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै॥

अर्थ:

बीच छाती में गदा की घोर कठोर चोट लगते ही वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके दसों मुखों से रक्त बहने लगा; वह फिर सँभलकर क्रोध से भरकर दौड़ा। दोनों अत्यन्त बलवान् योद्धा भिड़ गये और मल्लयुद्ध में एक-दूसरे के विरुद्ध होकर मारने लगे। श्रीरघुवीर के बल से गर्वित विभीषण उसे कुछ नहीं गिनता॥

दोहा

उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ। सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ॥ ९४ ॥

अर्थ:

हे उमा! विभीषण क्या कभी रावण के सामने आँख उठाकर भी देख सकता था? परन्तु अब वही काल के समान उससे भिड़ रहा है। यह श्रीरघुवीर का ही प्रभाव है॥