भरतजी के बाण से हनुमान का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान-संवाद

औषधि लेकर लौटते समय हनुमान पर भरतजी का बाण लगता है और वे क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो जाते हैं। फिर दोनों का अत्यंत भावपूर्ण संवाद होता है और भरतजी प्रभु का समाचार सुनते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण १५ / ३७

प्रकरण पाठ

दोहा

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि। बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥ ५८ ॥

अर्थ:

भरतजी ने आकाश में अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मन में अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कान तक धनुष को खींचकर बिना फल का एक बाण मारा।

दोहा 59 के अंतर्गत
चौपाई

परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक॥ सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए॥ १ ॥

अर्थ:

बाण लगते ही हनुमानजी 'राम, राम, रघुपति' का उच्चारण करते हुए मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। प्रिय वचन (रामनाम) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावली से हनुमानजी के पास आये।

चौपाई

बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥ मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥ २ ॥

अर्थ:

हनुमानजी को व्याकुल देखकर उन्होंने हृदय से लगा लिया। बहुत तरह से जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजी का मुख उदास हो गया। वे मन में बड़े दुखी हुए और नेत्रों में [विषाद के आँसुओं का] जल भरकर ये वचन बोले--।

चौपाई

जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥ जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया॥ ३ ॥

अर्थ:

जिस विधाता ने मुझे श्रीराम से विमुख किया, उसी ने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और काया से श्रीरामजी के चरणकमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो,

चौपाई

तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥ सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥ ४ ॥

अर्थ:

और यदि श्रीरघुनाथजी मुझपर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय! यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमानजी 'कोसलपति श्रीरामचन्द्रजी की जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे।

सोरठा

लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल। प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥ ५९ ॥

अर्थ:

भरतजी ने वानर (हनुमानजी) को हृदय से लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में [आनन्द तथा प्रेम के आँसुओं का] जल भर आया। रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके भरतजी के हृदय में प्रीति समाती न थी।

दोहा 60 के अंतर्गत
चौपाई

तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी॥ कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने॥ १ ॥

अर्थ:

[ भरतजी बोले--] हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकी सहित सुखनिधान श्रीरामजी की कुशल कहो। कपि (हनुमानजी) ने संक्षेप में सब चरित बखाने। सुनकर भरतजी दुखी हुए और मन में पछिताने लगे।

चौपाई

अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा॥ २ ॥

अर्थ:

हा दैव! मैं जगत में क्यों जन्मा? प्रभु के एक भी काम न आया। जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि से बोले बलबीरा॥

चौपाई

तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥ चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥ ३ ॥

अर्थ:

हे तात! तुम्हारे जाने में देर होगी और भोर होते ही काम बिगड़ जाएगा। [अतः] तुम पर्वत सहित मेरे बाण पर चढ़ जाओ, मैं तुम्हें वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपानिकेत श्रीरामजी हैं।

चौपाई

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी की यह बात सुनकर [एक बार तो] हनुमानजी के मन में अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजी के प्रभाव का विचार करके वे भरतजी के चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले--।

दोहा

तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत। अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत॥ ६० (क) ॥

अर्थ:

हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदय में रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजी के चरणों की वन्दना करके हनुमानजी चले।

दोहा

भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार। मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥ ६० (ख) ॥

अर्थ:

भरतजी के बाहुबल, शील (सुन्दर स्वभाव), गुण और प्रभु के चरणों में अपार प्रीति की मन ही मन बार-बार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमानजी चले जा रहे हैं।