भरतजी के बाण से हनुमान का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान-संवाद
औषधि लेकर लौटते समय हनुमान पर भरतजी का बाण लगता है और वे क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो जाते हैं। फिर दोनों का अत्यंत भावपूर्ण संवाद होता है और भरतजी प्रभु का समाचार सुनते हैं।
लंकाकाण्ड · प्रकरण १५ / ३७
प्रकरण पाठ
बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥ मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥ २ ॥
अर्थ:
हनुमानजी को व्याकुल देखकर उन्होंने हृदय से लगा लिया। बहुत तरह से जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजी का मुख उदास हो गया। वे मन में बड़े दुखी हुए और नेत्रों में [विषाद के आँसुओं का] जल भरकर ये वचन बोले--।
लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल। प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥ ५९ ॥
अर्थ:
भरतजी ने वानर (हनुमानजी) को हृदय से लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में [आनन्द तथा प्रेम के आँसुओं का] जल भर आया। रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके भरतजी के हृदय में प्रीति समाती न थी।
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥ ४ ॥
अर्थ:
भरतजी की यह बात सुनकर [एक बार तो] हनुमानजी के मन में अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजी के प्रभाव का विचार करके वे भरतजी के चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले--।