इंद्र का श्रीरामजी के लिये रथ भेजना, राम-रावण युद्ध

देवराज इंद्र श्रीरामजी के लिए दिव्य रथ और सारथि भेजते हैं। उस पर आरूढ़ होकर प्रभु राम रावण से और भी प्रचंड युद्ध करते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २४ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा॥ सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा॥ १ ॥

अर्थ:

देवताओं ने प्रभु को पैदल (बिना सवारी के युद्ध करते) देखा, तो उनके हृदय में बड़ा भारी क्षोभ (दुःख) उत्पन्न हुआ। इन्द्र ने तुरंत अपना रथ भेज दिया। उसका सारथि मातलि हर्ष के साथ उसे ले आया।

चौपाई

तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा॥ चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी॥ २ ॥

अर्थ:

उस दिव्य अनुपम और तेज पुंज रथ पर कोसलपुर के राजा श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर चढ़े। उसमें चार चंचल, मनोहर, अजर, अमर और मन की गति के समान शीघ्र चलनेवाले (देवलोक के) घोड़े जुते थे।

चौपाई

रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी॥ सही न जाइ कपिन्ह कै मारी। तब रावन माया बिस्तारी॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी को रथ पर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े। वानरों की मार सही नहीं जाती। तब रावण ने माया फैलायी।

चौपाई

सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची॥ देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी॥ ४ ॥

अर्थ:

उस माया से केवल श्रीरघुवीर ही बचे। लक्ष्मण और वानरों ने उसे सच मान लिया। वानरों ने राक्षसों की सेना में भाई लक्ष्मणजी सहित बहुत-से रामों को देखा।

छन्द

बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे। जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे॥ निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसलधनी। माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी॥

अर्थ:

बहुत-से राम और लक्ष्मण देखकर वानर-भालू मन में बहुत ही डर गये। लक्ष्मणजी सहित वे मानो चित्र लिखे-से जहाँ-तहाँ खड़े देखने लगे। अपनी सेना को चकित देखकर कोसलधनी ने हँसकर धनुष पर बाण चढ़ाया और पलभर में सारी माया हर ली। वानरों की सारी सेना हर्षित हो गयी॥

दोहा

बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर। द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर॥ ८९ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरामजी सब की ओर देखकर गम्भीर वचन बोले—हे वीरों! तुम सब बहुत ही थक गये हो, इसलिये अब द्वंद्वयुद्ध देखो।

दोहा 90 के अंतर्गत
चौपाई

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा॥ तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी ने ब्राह्मणों के चरणकमलों में सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब लंकेश के हृदय में क्रोध छा गया और वह गरजता तथा तर्जना करता हुआ सामने दौड़ा।

चौपाई

जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥ रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥ २ ॥

अर्थ:

[उसने कहा-- ] ओरे तपस्वी ! सुनो, तुमने युद्ध में जिन योद्धाओं को जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत् जानता है, लोकपाल जिसके बंदीखाने में पड़े हैं।

चौपाई

खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा॥ निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु॥ ३ ॥

अर्थ:

तुमने खर, दूषण और विराध को मारा। बेचारे बाली को व्याध की तरह वध किया। बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओं के समूह का संहार किया और कुम्भकर्ण तथा मेघनाद को भी मारा।

चौपाई

आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाही॥ आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले॥ ४ ॥

अर्थ:

अरे राजा! यदि तुम रण से भाग न गये तो आज मैं [वह] सारा वैर निकाल लूँगा। आज मैं तुम्हें निश्चय ही काल के हवाले कर दूँगा। तुम कठिन रावण के पाले पड़े हो।

चौपाई

सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥ सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥ ५ ॥

अर्थ:

रावण के दुर्वचन सुनकर और उसे कालवश जानकर कृपानिधान श्रीरामजी ने हँसकर यह वचन कहा-तुम्हारी सारी प्रभुता, जैसा तुम कहते हो, बिल्कुल सच है। पर अब व्यर्थ बकवाद न करो, अपना पुरुषार्थ दिखलाओ।

छन्द

जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा। संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥ एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं। एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥

अर्थ:

व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यश का नाश न करो। क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसार में तीन प्रकार के पुरुष होते हैं-पाटल (गुलाब), आम और कटहल के समान। एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल दोनों देते हैं और एक (कटहल) में केवल फल ही लगते हैं। इसी प्रकार [पुरुषों में] एक कहते हैं [करते नहीं], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक (तीसरे) केवल करते हैं, पर वाणी से कहते नहीं॥।

दोहा

राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान। बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥ ९० ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के वचन सुनकर वह खूब हँसा (और बोला--) मुझे ज्ञान सिखाते हो ? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं।

दोहा 91 के अंतर्गत
चौपाई

कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़ै सर॥ नानाकार सिलीमुख धाए। दिसि अरु बिदिसि गगन महि छाए॥ १ ॥

अर्थ:

दुर्वचन कहकर रावण क्रुद्ध होकर वज्र के समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकार के बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वी में, सब जगह छा गये।

चौपाई

पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा। छन महुँ जरे निसाचर तीरा॥ छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई। बान संग प्रभु फेरि चलाई॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरघुवीर ने अग्निबाण छोड़ा, [जिससे] रावण के सब बाण क्षणभर में भस्म हो गये। तब उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी। [किन्तु] श्रीरामचन्द्रजी ने उसको बाण के साथ वापस भेज दिया।

चौपाई

कोटिन्ह चक्र त्रिसूल पबारै। बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै॥ निफल होहिं रावन सर कैसें। खल के सकल मनोरथ जैसें॥ ३ ॥

अर्थ:

वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं। रावण के बाण किस प्रकार निष्फल होते हैं, जैसे दुष्ट मनुष्य के सब मनोरथ !।

चौपाई

तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि॥ राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा॥ ४ ॥

अर्थ:

तब उसने श्रीरामजी के सारथी को सौ बाण मारे। वह श्रीरामजी की जय पुकारकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। श्रीरामजी ने कृपा करके सारथी को उठाया। तब प्रभु अत्यन्त क्रोध को प्राप्त हुए।

छन्द

भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे। कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे॥ मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे। चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे॥

अर्थ:

युद्ध में शत्रु के विरुद्ध श्रीरघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकस में बाण कसमसाने लगे (बाहर निकलने को आतुर होने लगे)। उनके धनुष का अत्यन्त प्रचण्ड शब्द (टछ्लार) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गये (अत्यन्त भयभीत हो गये)। मन्दोदरी का हृदय काँप उठा; समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डर गये। दिशाओं के हाथी पृथ्वी को दाँतों से पकड़कर चिग्घाड़ने लगे। यह कौतुक देखकर देवता हँसे॥।

दोहा

तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल। राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल॥ ९१ ॥

अर्थ:

धनुष को कान तक तानकर श्रीरामचन्द्रजी ने भयानक बाण छोड़े। श्रीरामजी के बाणसमूह ऐसे चले मानो सर्प लहलहाते (लहराते) हुए जा रहे हों।

दोहा 92 के अंतर्गत
चौपाई

चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा॥ रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका॥ १ ॥

अर्थ:

बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों। उन्होंने पहले सारथि और घोड़ों को मार डाला। फिर रथ को चूर-चूर करके ध्वजा और पताकाओं को गिरा दिया। तब रावण बड़े जोर से गरजा, पर भीतर से उसका बल थक गया था।

चौपाई

तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना॥ बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के॥ २ ॥

अर्थ:

तुरंत दूसरे रथ पर चढ़कर खिसियाकर उसने नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र छोड़े। उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल हो रहे हैं जैसे परद्रोह में लगे हुए चित्तवाले मनुष्य के होते हैं।

चौपाई

तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा॥ तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक॥ ३ ॥

अर्थ:

तब रावण ने दस त्रिशूल चलाये और श्रीरामजी के चारों घोड़ों को मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया। घोड़ों को उठाकर श्रीरघुनाथजी ने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े।

चौपाई

रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी॥ दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे॥ ४ ॥

अर्थ:

रावण के सिररूपी कमलवन में विचरण करनेवाले श्रीरघुवीर के बाणरूपी भ्रमरों की पंक्ति चली। श्रीरामचन्द्रजी ने उसके दसों सिरों में दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गये और सिरों से रक्त के पनाले बह चले।

चौपाई

स्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना॥ तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे॥ ५ ॥

अर्थ:

रुधिर बहते हुए ही बलवान रावण दौड़ा। प्रभु ने फिर धनुष पर बाण सन्धान किया। श्रीरघुवीर ने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओं समेत दसों सिर काटकर पृथ्वी पर गिरा दिये।

चौपाई

काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने॥ प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए॥ ६ ॥

अर्थ:

काटते ही फिर नये हो गये। श्रीरामजी ने फिर भुजाओं और सिरों को काट गिराया। इस तरह प्रभु ने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे। परन्तु काटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये।

चौपाई

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा॥ रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू॥ ७ ॥

अर्थ:

प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरों को काट रहे हैं; क्योंकि कोसलपति श्रीरामजी बड़े कौतुकी हैं। आकाश में सिर और बाहु ऐसे छा गये हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों।

छन्द

जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्रवत सोनित धावहीं। रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं॥ एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं। जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं॥

अर्थ:

मानो अनेकों राहु और केतु रुधिर बहाते हुए आकाशमार्गसे दौड़ रहे हों। श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाणोंके [बार-बार] लगनेसे वे पृथ्वीपर गिरने नहीं पाते। एक-एक बाणसे समूह-के-समूह सिर छिदे हुए आकाशमें उड़ते ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो सूर्यकी किरणें क्रोध करके जहाँ-तहाँ बिधुंतुद पोहहीं॥।

दोहा

जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार। सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥ ९२ ॥

अर्थ:

जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरों को काटते हैं, वैसे-ही-वैसे वे अपार होते जाते हैं। जैसे विषयों का सेवन करने से काम (उन्हें भोगने की इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है।

दोहा 93 के अंतर्गत
चौपाई

दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी॥ गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी। धायउ दसहु सरासन तानी॥ १ ॥

अर्थ:

सिरों की बाढ़ देखकर रावण को अपना मरण भूल गया और बड़ा गहरा क्रोध हुआ। वह महान्‌ अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुषों को तानकर दौड़ा।

चौपाई

समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो॥ दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ॥ २ ॥

अर्थ:

रणभूमि में रावण ने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्रीरघुनाथजी के रथ को ढक दिया। एक दण्ड (घड़ी) तक रथ दिखलायी न पड़ा, मानो कुहरे में सूर्य छिप गया हो।

चौपाई

हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा। तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा॥ सर निवारि रिपु के सिर काटे। ते दिसि बिदिसि गगन महि पाटे॥ ३ ॥

अर्थ:

जब देवताओं ने हाहाकार किया, तब प्रभु ने क्रोध करके धनुष उठाया। और शत्रु के बाणों को हटाकर उन्होंने शत्रु के सिर काटे और उनसे दिशा-विदिशा, आकाश और पृथ्वी सब को पाट दिया।

चौपाई

काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं॥ कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा॥ ४ ॥

अर्थ:

काटे हुए सिर आकाशमार्ग से दौड़ते हैं और जय-जय की ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं। लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं?

छन्द

कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले। संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले॥ सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं। करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं॥

अर्थ:

राम कहाँ हैं? यह कहकर सिरों के निकर दौड़े, उन्हें देखकर वानर भाग चले। तब धनुष सन्धान करके रघुकुलमणि श्रीरामजी ने हँसकर बाणों से उन सिरों को भलीभाँति बेध डाला। हाथों में मुण्डों की मालाएँ लेकर बहुत-सी कालिकाएँ झुंड-झुंड मिलकर इकट्ठी हुईं और वे रुधिर की नदी में स्नान करके चलीं, मानो संग्रामरूपी वट-पूजन करने जा रही हों॥