रावण को मंदोदरी का समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाद
मंदोदरी रावण को सीताजी को लौटाकर कल्याण का मार्ग अपनाने की सीख देती है। इसके बाद रावण और प्रहस्त के बीच युद्ध और नीति पर विचार होता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ४ / ३७
प्रकरण पाठ
अति बल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे॥ जेहिं बलि बाँधि सहसभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा॥ ४ ॥
अर्थ:
[विष्णुरूप से] अत्यन्त बलवान् मधु और कैटभ [दैत्य] मारने वाले; [वराह और नृसिंहरूप से] महावीर दिति के पुत्रों का संहार करने वाले; [वामनरूप से] जिन्होंने बलि को बाँधकर सहस्रबाहु को मारा, वे ही [भगवान्] पृथ्वी का भार हरने के लिये [रामरूप में] अवतीर्ण (प्रकट) हुए हैं।
संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन॥ तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता॥ २ ॥
अर्थ:
हे दशमुख ! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन (बुढ़ापे) में राजा को वन में चला जाना चाहिये। हे स्वामी ! वहाँ (वन में) आप उनका भजन कीजिये जो सृष्टि के रचने वाले, पालने वाले और संहार करने वाले हैं।
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई॥ मंदोदरीं हृदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना॥ ३ ॥
अर्थ:
मन्दोदरी ने उसे बहुत तरह से समझाकर कहा [किन्तु रावण ने उसकी एक भी बात न सुनी] और वह फिर सभा में जाकर बैठ गया। मन्दोदरी ने हृदय में ऐसा जान लिया कि काल के वश होने से पति को अभिमान हो गया है।
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती॥ बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा॥ १ ॥
अर्थ:
ये सभी मूर्ख (खुशामदी) मन्त्री ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कह रहे हैं। हे नाथ! इस प्रकार की बातों से काम पूरा नहीं पड़ेगा। एक ही बंदर समुद्र लाँघकर आया था। उसका चरित्र सब लोग अब भी मन-ही-मन गाया करते हैं (स्मरण किया करते हैं)।
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू॥ सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा॥ २ ॥
अर्थ:
उस समय तुम लोगों में से किसी को भूख न थी? [बंदर तो तुम्हारा भोजन ही हैं, फिर] नगर जलाते समय उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया? इन मन्त्रियों ने स्वामी (आप) को ऐसी सम्मति सुनायी है जो सुनने में अच्छी है पर जिससे आगे चलकर दुःख पाना होगा।
तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर॥ प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
हे तात! मेरे वचनों को बहुत आदर से (बड़े गौर से) सुनिये। मुझे मन में कायर न समझ लीजियेगा। जगत् में ऐसे मनुष्य झुंड-के-झुंड (बहुत अधिक) हैं, जो प्यारी (मुँह पर मीठी लगने वाली) बात ही सुनते और कहते हैं।
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे॥ प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती॥ ५ ॥
अर्थ:
हे प्रभो! सुनने में कठोर परन्तु [परिणाम में] परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं। नीति सुनिये, [उसके अनुसार] पहले दूत भेजिये, और [फिर] सीता को देकर श्रीरामजी से प्रीति [मेल] कर लीजिये।
अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई॥ सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा॥ २ ॥
अर्थ:
अभी से हृदय में सन्देह (भय) हो रहा है? हे पुत्र! तू तो बाँस की जड़ में घमोई हुआ (तू मेरे वंश के अनुकूल या अनुरूप नहीं हुआ)। पिता की अत्यन्त घोर और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घर को चला गया।