नल-नील द्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजी द्वारा श्रीरामेश्वर की स्थापना

नल-नील की सहायता से वानर सेना समुद्र पर सेतु का निर्माण करती है। प्रभु श्रीरामजी श्रीरामेश्वर की स्थापना कर आगे की विजययात्रा को पावन करते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २ / ३७

प्रकरण पाठ

दोहा

लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड। भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥ ० (क) ॥

अर्थ:

लव, निमेष, परमाणु, युग, वर्ष और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीरामजी को क्यों नहीं भजता?

सोरठा

सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ। अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु॥ ० (ख) ॥

अर्थ:

समुद्र के वचन सुनकर प्रभु श्रीरामजी ने मन्त्रियों को बुलाकर ऐसा कहा--अब विलम्ब किसलिए हो रहा है? सेतु (पुल) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे।

सोरठा

सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह। नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहिं॥ ० (ग) ॥

अर्थ:

जाम्बवान् ने हाथ जोड़कर कहा-हे सूर्यकुल के ध्वजा-स्वरूप (कीर्तिको बढ़ानेवाले) श्रीरामजी! सुनिये। हे नाथ! [सबसे बड़ा] सेतु तो आपका नाम ही है, जिसपर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर) मनुष्य संसाररूपी समुद्र से पार हो जाते हैं।

चौपाई

यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा॥ प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी॥ १ ॥

अर्थ:

फिर यह छोटा-सा समुद्र पार करने में कितनी देर लगेगी? ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्रीहनुमानजी ने कहा-प्रभु का प्रताप भारी बड़वानल (समुद्र की आग) के समान है। इसने पहले समुद्र के जल को सोख लिया था।

चौपाई

तव रिपु नारि रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा॥ सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी॥ २ ॥

अर्थ:

परन्तु आपके शत्रुओं की स्त्रियों के आँसुओं की धार से यह फिर भर गया और उसी से खारा भी हो गया। हनुमानजी की यह अत्युक्ति सुनकर वानर श्रीरघुनाथजी की ओर देखकर हर्षित हो गये।

चौपाई

जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई॥ राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

जाम्बवान् ने नल-नील दोनों भाइयों को बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनायी [और कहा--] मन में श्रीरामजी के प्रताप को स्मरण करके सेतु तैयार करो, [रामप्रताप से] कुछ भी परिश्रम नहीं होगा।

चौपाई

बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी॥ राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर वानरों के समूह को बुला लिया [और कहा--] आप सब लोग मेरी कुछ विनती सुनिये। अपने हृदय में श्रीरामजी के चरण-कमलों को धारण कर लीजिये और सब भालू और वानर एक खेल कीजिये।

चौपाई

धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा॥ सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा॥ ५ ॥

अर्थ:

विकट वानरों के समूह (आप) दौड़ जाइये और वृक्षों तथा पर्वतों के समूहों को उखाड़ लाइये। यह सुनकर वानर और भालू हूहा करके और श्रीरघुनाथजी के प्रताप-समूह की जय पुकारते हुए चले।

दोहा

अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ। आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ॥ १ ॥

अर्थ:

बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वतों और वृक्षों को खेल की तरह ही [उखाड़कर] उठा लेते हैं और ला-लाकर नल-नील को देते हैं। वे अच्छी तरह गढ़कर [सुन्दर] सेतु बनाते हैं।

दोहा 2 के अंतर्गत
चौपाई

सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं॥ देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥ १ ॥

अर्थ:

वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की तरह ले लेते हैं। सेतु की अत्यन्त सुन्दर रचना देखकर कृपानिधि श्रीरामजी हँसकर वचन बोले--।

चौपाई

परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी॥ करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना॥ २ ॥

अर्थ:

यह (यहाँ की) भूमि परम रमणीय और उत्तम है। इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। मैं यहाँ शिवजी की स्थापना करूँगा। मेरे हृदय में यह परम कल्पना है।

चौपाई

सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए॥ लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव ने बहुत-से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियों को बुलाकर ले आये। शिवलिंग की स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया। [फिर भगवान् बोले--] शिवजी के समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है।

चौपाई

सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥ संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता। शंकरजी से विमुख होकर जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है।

दोहा

संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥ २ ॥

अर्थ:

जिनको शंकरप्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं; एवं जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास [बनना चाहते] हैं, वे मनुष्य कल्प भर घोर नरक में निवास करते हैं।

दोहा 3 के अंतर्गत
चौपाई

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं॥ जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि॥ १ ॥

अर्थ:

जो मनुष्य [मेरे स्थापित किये हुए इन] रामेश्वरजी का दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोक को जायँगे। और जो गंगाजल लाकर इन पर चढ़ायेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा (अर्थात् मेरे साथ एक हो जायगा)।

चौपाई

होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥ मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥ २ ॥

अर्थ:

जो छल छोड़कर और निष्काम होकर सेवा करेंगे, उन्हें शंकरजी मेरी भक्ति देंगे। और जो मेरे बनाये सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्र से तर जायगा।

चौपाई

राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए॥ गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के वचन सबके मन को अच्छे लगे। तदनन्तर वे श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमों को लौट आये। [शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती! श्रीरघुनाथजी की यह रीति है कि वे शरणागत पर सदा प्रीति करते हैं।

चौपाई

बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर॥ बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई॥ ४ ॥

अर्थ:

चतुर नल और नील ने सेतु बाँधा। श्रीरामजी की कृपा से उनका यह यश उजागर हो गया। जो पत्थर डूबते हैं और दूसरों को डुबा देते हैं, वे ही जहाज के समान [स्वयं तैरनेवाले और दूसरों को पार ले जानेवाले] हो गये।

चौपाई

महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी॥ ५ ॥

अर्थ:

यह न तो समुद्र की महिमा वर्णन की गयी है, न पत्थरों का गुण है और न वानरों की ही कोई करामात है।

दोहा

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान। ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरघुवीर के प्रताप से पत्थर भी समुद्र पर तैर गये। ऐसे श्रीरामजी को छोड़कर जो किसी दूसरे प्रभु को जाकर भजते हैं वे [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं।

दोहा 4 के अंतर्गत
चौपाई

बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा॥ चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई॥ १ ॥

अर्थ:

नल-नील ने सेतु बाँधकर उसे बहुत मजबूत बनाया। देखने पर वह कृपानिधान श्रीरामजी के मन को [बहुत ही] अच्छा लगा। सेना चली, जिसका कुछ वर्णन नहीं हो सकता। योद्धा वानरों के समुदाय गरज रहे हैं।

चौपाई

सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई॥ देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा॥ २ ॥

अर्थ:

कृपालु श्रीरघुनाथजी सेतुबन्ध के ढिग चढ़कर समुद्र का विस्तार देखने लगे। करुणाकन्द प्रभु के दर्शन के लिये सब जलचरों के समूह प्रकट हो गये (जल के ऊपर निकल आये)।

चौपाई

मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला॥ अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

बहुत तरह के मगर, नक्र (घड़ियाल), मछलियाँ और साँप थे, जिनके शरीर सौ योजन के और परम विशाल थे। कुछ ऐसे भी थे जो उनको भी खा जाते हैं। किसी-किसी के डर से वे भी डर रहे थे।

चौपाई

प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे॥ तिन्ह कीं ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी॥ ४ ॥

अर्थ:

वे सब [वैर-विरोध भूलकर] प्रभु के दर्शन कर रहे हैं, हटाने से भी नहीं हटते। सब के मन हर्षित हैं; सब सुखी हो गये। उनकी ओट के कारण जल नहीं दिखाई पड़ता। वे सब भगवान् का रूप देखकर [आनन्द और प्रेम में] मग्न हो गये।

चौपाई

चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई॥ ५ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर सेना चली। वानर-सेना की विपुलता (अत्यधिक संख्या) को कौन कह सकता है?

दोहा

सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥ ४ ॥

अर्थ:

सेतुबन्ध पर बड़ी भीड़ हो गयी, इससे कुछ वानर आकाशमार्ग से उड़ने लगे और दूसरे [कितने ही] जलचर जीवों पर चढ़-चढ़कर पार जा रहे हैं।