राम-रावण युद्ध, रावण वध, सर्वत्र जयध्वनि

रामजी और रावण के बीच निर्णायक युद्ध होता है। प्रभु के अमोघ बाण से रावण का अंत होता है और चारों ओर विजय की जयध्वनि गूँज उठती है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २९ / ३७

प्रकरण पाठ

छन्द

जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड। बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच॥ १ ॥

अर्थ:

जब उसने पाखण्ड रचा, तब भयंकर जीव प्रकट हो गये। बेताल, भूत और पिशाच हाथों में धनुष-बाण लिये प्रकट हुए।

छन्द

जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल। करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान॥ २ ॥

अर्थ:

योगिनियाँ एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में मनुष्य की खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरह के गीत गाने लगीं।

छन्द

धरु मारु बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर। मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान॥ ३ ॥

अर्थ:

वे “पकड़ो, मारो” आदि घोर शब्द बोल रही हैं। चारों ओर (सब दिशाओं में) यह ध्वनि भर गयी। वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगे।

छन्द

जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि। भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु॥ ४ ॥

अर्थ:

वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। वानर-भालू व्याकुल हो गये। फिर रावण बालू बरसाने लगा।

छन्द

जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस। लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत॥ ५ ॥

अर्थ:

वानरों को जहाँ-तहाँ थकित कर रावण फिर गरजा। लक्ष्मणजी और कपीश समेत सभी वीर अचेत हो गये।

छन्द

हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ। एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि॥ ६ ॥

अर्थ:

हा राम! हा रघुनाथ! पुकारते हुए सुभट अपने हाथ मलते हैं। इस प्रकार सकल बल तोड़कर उसने फिर कपट रचा।

छन्द

प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान। तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाइ॥ ७ ॥

अर्थ:

उसने बहुत-से हनुमान् प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े। उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजी को जा घेरा।

छन्द

मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ। दहँ दिसि लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज॥ ८ ॥

अर्थ:

वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, “मारो, पकड़ो, जाने न पावे।” उनके लंगूर दसों दिशाओं में शोभा दे रहे हैं और उनके बीच में कोसलराज श्रीरामजी हैं।

छन्द

तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही। जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही॥ प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी। रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी॥ १ ॥

अर्थ:

उनके बीच में कोसलराज का सुंदर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो ऊँचे तमाल वृक्ष के लिये अनेक इन्द्रधनुषों की श्रेष्ठ बाड़ बनायी गयी हो। प्रभु को देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हृदय से 'जय, जय, जय' ऐसा बोलने लगे। तब श्रीरघुवीर ने क्रोध करके एक ही बाण से निमेषमात्र में रावण की सारी माया हर ली।

छन्द

माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे। सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे॥ श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं। सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥ २ ॥

अर्थ:

माया दूर हो जाने पर वानर-भालू हर्षित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले-लेकर सब लौट पड़े। श्रीरामजी ने बाणों के समूह छोड़े, जिनसे रावण के बाहु और सिर फिर पृथ्वी पर गिर पड़े। श्रीरामजी और रावण के युद्ध का चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पों तक गाते रहें, तो भी वे उसका पार नहीं पा सकते।

दोहा

ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास। जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास॥ १०१ क ॥

अर्थ:

उसी चरित्र के कुछ गुणगण मन्दबुद्धि तुलसीदास ने कहे हैं, जैसे मक्खी भी अपने बल के अनुसार आकाश में उड़ती है।

दोहा

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस। प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥ १०१ ख ॥

अर्थ:

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस। प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥

दोहा 102 के अंतर्गत
चौपाई

काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥ मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥ १ ॥

अर्थ:

काटते ही सिरों का समूह बढ़ जाता है जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ अधिकाई। मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण की ओर देखा।

चौपाई

उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥ सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥ २ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिसकी इच्छामात्र से काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवक की प्रीति की परीक्षा ले रहे हैं। [विभीषणजी ने कहा--] हे सर्वज्ञ! हे चराचर के स्वामी! हे शरणागत के पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियों को सुख देनेवाले! सुनिये--।

चौपाई

नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥ सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥ ३ ॥

अर्थ:

इसके नाभिकुण्ड में अमृत का निवास है। हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है। विभीषण के वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजी ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिये।

चौपाई

असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥ बोलहिं खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥ ४ ॥

अर्थ:

उस समय नाना प्रकार के अशकुन होने लगे। बहुत-से गधे, सियार और कुत्ते रोने लगे। जगत् के दुःख (अशुभ) को सूचित करने के लिये पक्षी बोलने लगे। आकाश में जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गये।

चौपाई

दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा॥ मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्रवहिं नयन मग बारी॥ ५ ॥

अर्थ:

दसों दिशाओं में अत्यन्त दाह होने लगा (आग लगने लगी)। बिना ही पर्व (योग) के सूर्यग्रहण होने लगा। मन्दोदरी का हृदय बहुत काँपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-मार्ग से जल बहाने लगीं।

छन्द

प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही। बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही॥ उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिं जय जए। सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए॥

अर्थ:

मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाश से वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, केश और धूल की वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने अधिक अमंगल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है? अपरिमित उत्पात देखकर आकाश में देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे। देवताओं को भयभीत जानकर कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुष पर बाण सन्धान करने लगे॥।

दोहा

खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस। रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ १०२ ॥

अर्थ:

कानों तक धनुष को खींचकर श्रीरघुनाथजी ने इकतीस बाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्रजी के बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों।

दोहा 103 के अंतर्गत
चौपाई

सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥ लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥ १ ॥

अर्थ:

एक बाण ने नाभि के अमृतकुण्ड को सोख लिया। दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओं में लगे। बाण सिरों और भुजाओं को लेकर चले। सिर और भुजा हीन रुण्ड पृथ्वी पर नाचने लगा।

चौपाई

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥ गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥ २ ॥

अर्थ:

धड़ प्रचण्ड वेग से दौड़ता है, जिससे धरती धँसने लगी। तब प्रभु ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। मरते समय रावण बड़े घोर शब्द से गरजकर बोला--राम कहाँ हैं? मैं ललकारकर उनको युद्ध में मारूँ!।

चौपाई

डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥ धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥ ३ ॥

अर्थ:

रावण के गिरते ही पृथ्वी हिल गयी। समुद्र, नदियाँ, दिशाओं के हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे। रावण के धड़ के दोनों टुकड़े फैलाकर भालू और वानरों के समुदाय को दबाते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा।

चौपाई

मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा॥ प्रबिसे सब निषंग महुँ जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥ ४ ॥

अर्थ:

रावण की भुजाओं और सिरों को मन्दोदरी के सामने रखकर राम-बाण वहाँ चले, जहाँ जगदीश्वर श्रीरामजी थे। सब बाण जाकर तरकस में प्रवेश कर गये। यह देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाये।

चौपाई

तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन॥ जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥ ५ ॥

अर्थ:

रावण का तेज प्रभु के मुख में समा गया। यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए। ब्रह्माण्ड भर में जय-जय की ध्वनि भर गयी। प्रबल भुजदण्डों वाले श्रीरघुवीर की जय हो।

चौपाई

बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा॥ ६ ॥

अर्थ:

देवता और मुनियों के समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं--कृपालु की जय हो, मुकुन्द की जय हो, जय हो!।

छन्द

जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो। खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥ सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही। संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥ १ ॥

अर्थ:

हे कृपा के कन्द! हे मोक्षदाता मुकुन्द ! हे [राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि] द्वन्द्वों के हरनेवाले ! हे शरणागत को सुख देनेवाले प्रभो! हे दुष्ट-दल को विदीर्ण करनेवाले! हे कारणों के भी परम कारण! हे सदा करुणा करनेवाले ! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो। देवता हर्ष में भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाड़े बज रहे हैं। रणभूमि में श्रीरामचन्द्रजी के अंगों ने बहुत-से कामदेवों की शोभा प्राप्त की।

छन्द

सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं। जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं॥ भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने। जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥ २ ॥

अर्थ:

सिर पर जटाओं का मुकुट है, जिसके बीच-बीच में अत्यन्त मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं। मानो नीले पर्वत पर बिजली के समूह सहित नक्षत्र सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी अपने भुजदण्डों से बाण और धनुष फिरा रहे हैं। शरीर पर रुधिर के कण अत्यन्त सुन्दर लगते हैं। मानो तमाल के वृक्ष पर बहुत-सी रायमुनियाँ चिड़ियाँ अपने विपुल सुख में मग्र हुई निश्चल बैठी हों।

दोहा

कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद। भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥ १०३ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने कृपादृष्टि की वर्षा करके देवसमूह को निर्भय कर दिया। वानर-भालू सब हर्षित हुए और सुखधाम मुकुन्द की जय हो, ऐसा पुकारने लगे।