लक्ष्मण-रावण युद्ध

लक्ष्मणजी और रावण के बीच तीव्र युद्ध छिड़ता है। दोनों ओर से चलने वाले अस्त्र-शस्त्र रणभूमि को विकराल बना देते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २२ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू॥ खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती॥ १ ॥

अर्थ:

[लक्ष्मणजी ने पास जाकर कहा--] अरे दुष्ट! वानर-भालुओं को क्या मार रहा है? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ! [रावण ने कहा--] ओ रे मेरे पुत्र के घातक! मैं तुझको ढूँढ़ रहा था। आज तुझे मारकर [अपनी] छाती ठंडी करूँगा।

चौपाई

अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा॥ कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे॥ २ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर उसने प्रचंड बाण छोड़े। लक्ष्मणजी ने सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले। रावण ने करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाये। लक्ष्मणजी ने उनको तिल के बराबर करके काटकर हटा दिया।

चौपाई

पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा॥ सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर अपने बाणों से [उस पर] प्रहार किया और [उसके] रथ को तोड़कर सारथी को मार डाला। [रावण के] दसों मस्तकों में सौ-सौ बाण मारे। वे सिरों में ऐसे पैठ गये मानो पहाड़ के शिखरों में सर्प प्रवेश कर रहे हों।

चौपाई

पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं॥ उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर सौ बाण उसकी छाती में मारे। वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा। फिर मूर्च्छा टूटने पर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलायी जो ब्रह्मा ने उसे दी थी।

छन्द

सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही। पर्‌यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥ ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी। तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥

अर्थ:

वह ब्रह्मा की दी हुई प्रचण्ड शक्ति अनन्त की छाती में लगी। वीर व्याकुल होकर गिर पड़ा। तब दसमुख उसे उठाने लगा, पर उसके अतुल बल की महिमा रह गई। ब्रह्मांड-भवन में विराजने वाले जिनके एक सिर पर धूल का कण-सा लगता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है। वह त्रिभुवन के धनी को नहीं जानता।

दोहा

देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर। आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर॥ ८३ ॥

अर्थ:

यह देखकर पवनपुत्र हनुमानजी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े। हनुमानजी के आते ही रावण ने उन पर अत्यन्त भयकर घूँसे का प्रहार किया।