घोर युद्ध, रावण की मूर्छा

युद्ध अत्यन्त उग्र हो उठता है और रामजी के प्रहारों से रावण मूर्छित हो जाता है। फिर भी अहंकारवश वह पुनः संभलकर रणभूमि में डटा रहता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २७ / ३७

प्रकरण पाठ

छन्द

गहि भूमि पार्‌यो लात मार्‌यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो। संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो॥ करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई। किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई॥

अर्थ:

उसे पकड़कर पृथ्वी पर गिराकर लात मारकर बालिसुत अंगद प्रभु के पास चले गये। रावण सँभलकर उठा और बड़े भयानक कठोर शब्द से गरजने लगा। वह दर्प करके दसों धनुष चढ़ाकर उन पर बहुत-से बाण सन्धान करके बरसाने लगा। उसने सब योद्धाओं को घायल कर दिया और भयाकुल कर दिया तथा अपना बल देखकर वह हर्षित होने लगा॥

दोहा

तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप। काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप॥ ९७ ॥

अर्थ:

तब श्रीरघुनाथजी ने रावण के सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डाले। पर वे फिर बहुत बढ़ गये, जैसे तीर्थ में किये हुए पाप बढ़ जाते हैं (कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करते हैं) !।

दोहा 98 के अंतर्गत
चौपाई

सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी॥ मरत न मूढ़ कटेहुँ भुज सीसा। धाए कोपि भालु भट कीसा॥ १ ॥

अर्थ:

शत्रु के सिर और भुजाओं की बढ़ती देखकर रीछ-वानरों को बहुत ही क्रोध हुआ। यह मूर्ख भुजाओं के और सिरों के कटने पर भी नहीं मरता, [ऐसा कहते हुए] भालू और वानर योद्धा क्रोध करके दौड़े।

चौपाई

बालितनय मारुति नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला॥ बिटप महीधर करहिं प्रहारा। सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा॥ २ ॥

अर्थ:

बालिपुत्र अंगद, मारुति हनुमानजी, नल, नील, वानरराज सुग्रीव और द्विविद आदि बलवान् उस पर वृक्ष और पर्वतों का प्रहार करते हैं। वह उन्हीं पर्वतों और वृक्षों को पकड़कर वानरों को मारता है।

चौपाई

एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भागि चलहिं एक लातन्ह मारी॥ तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

कोई एक वानर नखों से शत्रु के शरीर को फाड़कर भाग जाते हैं, तो कोई उसे लातों से मारकर। तब नल और नील रावण के सिरों पर चढ़ गये और नखों से उसके ललाट को फाड़ने लगे।

चौपाई

रुधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी॥ गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

रक्त देखकर उसके हृदय में बड़ा विषाद हुआ। उसने उनको पकड़ने के लिये भुजाएँ फैलाईं, पर वे पकड़ में नहीं आते, हाथों के ऊपर-ऊपर ही फिरते हैं, मानो दो भौरे कमलों के वन में विचरण कर रहे हों।

चौपाई

कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी॥ पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे। सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे॥ ५ ॥

अर्थ:

तब उसने क्रोध करके उछलकर दोनों को पकड़ लिया। पृथ्वी पर पटकते समय वे उसकी भुजाओं को मरोड़कर भाग छूटे। उसने क्रोध करके हाथों में दस धनुष लिये और वानरों को बाणों से मारकर घायल कर दिया।

चौपाई

हनुमदादि मुरुछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर॥ मुरुछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा॥ ६ ॥

अर्थ:

हनुमानजी आदि सब वानरों को मूर्छित करके और संध्या का समय पाकर रावण हर्षित हुआ। समस्त वानर-वीरों को मूर्छित देखकर रणधीर जामवंत दौड़े।

चौपाई

संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी॥ भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना॥ ७ ॥

अर्थ:

जाम्बवान् के साथ जो भालू थे, वे पर्वत और वृक्ष धारण किये रावण को ललकार-ललकारकर मारने लगे। बलवान रावण क्रोधित हुआ और पैर पकड़-पकड़कर वह अनेक योद्धाओं को पृथ्वी पर पटकने लगा।

चौपाई

देखि भालुपति निज दल घाता। कोपि माझ उर मारेसि लाता॥ ८ ॥

अर्थ:

जाम्बवान ने अपने दल का विध्वंस देखकर क्रोध करके रावण की छाती में लात मारी।

छन्द

उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा। गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा॥ मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयो। निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो॥

अर्थ:

छाती में लात का प्रचण्ड आघात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसने बीसों हाथों में भालुओं को पकड़ रखा था। [ऐसा जान पड़ता था] मानो रात्रि के समय भौरे कमलों में बसे हुए हों। उसे मूर्छित देखकर, फिर लात मारकर ऋक्षराज जामवंत प्रभु के पास चले गये। रात्रि जानकर सारथि रावण को रथ में डालकर उसे होश में लाने का उपाय करने लगा॥

दोहा

मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास। निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास॥ ९८ ॥

अर्थ:

मूर्छा दूर होने पर सब रीछ-वानर प्रभु के पास आये। उधर सब राक्षसों ने बहुत ही भयभीत होकर रावण को घेर लिया।