रावण-हनुमान युद्ध, रावण की मायारचना और रामजी द्वारा माया नाश
हनुमानजी निर्भय होकर रावण से युद्ध करते हैं। रावण अपनी मायावी रचनाएँ फैलाता है, पर रामजी उन्हें तत्काल नष्ट कर देते हैं।
लंकाकाण्ड · प्रकरण २६ / ३७
प्रकरण पाठ
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं। कज्जलगिरि सुमेरु जनु लरहीं॥ बुधि बल निसिचर परइ न पार्यो। तब मारुतसुत प्रभु संभार्यो॥ ४ ॥
अर्थ:
दोनों बहुत-से छल-बल करते हुए आकाश में ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कजलगिरि और सुमेरु पर्वत लड़ रहे हों। जब बुद्धि और बल से राक्षस गिराये न गिरा तब मारुति श्रीहनुमानजी ने प्रभु को स्मरण किया।
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो। महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो॥ हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले। रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले॥
अर्थ:
श्रीरघुवीर का स्मरण करके धीर हनुमानजी ने ललकारकर रावण को मारा। वे दोनों पृथ्वी पर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं; देवताओं ने दोनों की जय-जय पुकारी। हनुमानजी पर संकट देखकर वानर-भालू क्रोधातुर होकर दौड़े। किन्तु रण-मत्त रावण ने सब योद्धाओं को अपने प्रचण्ड भुजाओं के बल से कुचल और मसल डाला॥
सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर॥ रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी॥ ४ ॥
अर्थ:
एक ही रावण ने सब देवताओं को जीत लिया था, अब तो बहुत-से रावण हो गये हैं। इससे अब पहाड़ की गुफाओं का आश्रय लो। वहाँ ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभु की कुछ महिमा जानी थी।
जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे। चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥ हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे। मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥
अर्थ:
जो प्रभु का प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे। वानरों ने शत्रुओं को सच्चा ही मान लिया। [इससे] सब वानर-भालू विचलित होकर हे कृपालु! रक्षा कीजिये! यों पुकारते हुए भय से व्याकुल होकर भाग चले। अत्यन्त बलवान् रणबाँकुरे हनुमानजी, अंगद, नील और नल लड़ते हैं और कपटरूपी भूमि से अंकुरों की भाँति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा रावणों को मसलते हैं॥
प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी॥ रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे॥ १ ॥
अर्थ:
प्रभु ने क्षण भर में सब माया काट डाली। जैसे सूर्य के उदय होते ही अन्धकार की राशि फट जाती है (नष्ट हो जाती है)। अब एक ही रावण को देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभु पर बहुत-से पुष्प बरसाये।
अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें॥ सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल॥ ३ ॥
अर्थ:
देवताओं को श्रीरामजी की स्तुति करते देखकर रावण ने सोचा, मैं इनकी समझ में एक हो गया। [परन्तु इन्हें यह पता नहीं कि इनके लिये मैं एक ही बहुत हूँ] और कहा—अरे मूर्खो! तुम तो सदा के ही मेरे मरने वाले हो। ऐसा कहकर वह क्रोध करके आकाश पर [देवताओं की ओर] दौड़ा।