रावण-हनुमान युद्ध, रावण की मायारचना और रामजी द्वारा माया नाश

हनुमानजी निर्भय होकर रावण से युद्ध करते हैं। रावण अपनी मायावी रचनाएँ फैलाता है, पर रामजी उन्हें तत्काल नष्ट कर देते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २६ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी॥ रथ तुरंग सारथी निपाता। हृदय माझ तेहि मारेसि लाता॥ १ ॥

अर्थ:

विभीषण को बहुत ही थका हुआ देखकर हनुमानजी पर्वत धारण किये हुए दौड़े। उन्होंने उस पर्वत से रावण के रथ, घोड़े और सारथी का संहार कर डाला और उसके सीने पर लात मारी।

चौपाई

ठाढ़ रहा अति कंपित गाता। गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता॥ पुनि रावन कपि हतेउ पचारी। चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी॥ २ ॥

अर्थ:

रावण खड़ा रहा, पर उसका शरीर अत्यन्त काँपने लगा। विभीषण वहाँ गये जहाँ जनों के रक्षक श्रीरामजी थे। फिर रावण ने हनुमानजी को ललकारा। वे पूँछ फैलाकर आकाश में चले गये।

चौपाई

गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना। पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना॥ लरत अकास जुगल सम जोधा। एकहि एकु हनत करि क्रोधा॥ ३ ॥

अर्थ:

रावण ने पूँछ पकड़ ली, हनुमानजी उसको साथ लिये हुए ऊपर उड़े। फिर लौटकर महाबलवान् हनुमानजी उससे भिड़ गये। दोनों समान योद्धा आकाश में लड़ते हुए एक-दूसरे को क्रोध करके मारने लगे।

चौपाई

सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं। कज्जलगिरि सुमेरु जनु लरहीं॥ बुधि बल निसिचर परइ न पार्‌यो। तब मारुतसुत प्रभु संभार्‌यो॥ ४ ॥

अर्थ:

दोनों बहुत-से छल-बल करते हुए आकाश में ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कजलगिरि और सुमेरु पर्वत लड़ रहे हों। जब बुद्धि और बल से राक्षस गिराये न गिरा तब मारुति श्रीहनुमानजी ने प्रभु को स्मरण किया।

छन्द

संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो। महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो॥ हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले। रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले॥

अर्थ:

श्रीरघुवीर का स्मरण करके धीर हनुमानजी ने ललकारकर रावण को मारा। वे दोनों पृथ्वी पर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं; देवताओं ने दोनों की जय-जय पुकारी। हनुमानजी पर संकट देखकर वानर-भालू क्रोधातुर होकर दौड़े। किन्तु रण-मत्त रावण ने सब योद्धाओं को अपने प्रचण्ड भुजाओं के बल से कुचल और मसल डाला॥

दोहा

तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड। कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड॥ ९५ ॥

अर्थ:

तब श्रीरघुवीर के ललकारने पर प्रचण्ड वीर वानर दौड़े। वानरों के प्रबल दल को देखकर रावण ने माया प्रकट की।

दोहा 96 के अंतर्गत
चौपाई

अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका॥ रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते॥ १ ॥

अर्थ:

क्षण भर के लिए वह अदृश्य हो गया। फिर उस दुष्ट ने अनेकों रूप प्रकट किये। श्रीरघुनाथजी की सेना में जितने रीछ-वानर थे, उतने ही रावण जहाँ-तहाँ प्रकट हो गये।

चौपाई

देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा॥ भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा॥ २ ॥

अर्थ:

वानरों ने अपरिमित रावण देखे। भालू और वानर सब जहाँ-तहाँ (इधर-उधर) भाग चले। वानर धीरज नहीं धरते। हे लक्ष्मणजी! हे रघुवीर! बचाइये, बचाइये, यों पुकारते हुए वे भागे जा रहे हैं।

चौपाई

दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन॥ डरे सकल सुर चले पराई। जय कै आस तजहु अब भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

दसों दिशाओं में करोड़ों रावण दौड़ते हैं और घोर, कठोर, भयानक गर्जन कर रहे हैं। सब देवता डर गये और ऐसा कहते हुए भाग चले कि हे भाई! अब जय की आशा छोड़ दो!

चौपाई

सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर॥ रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी॥ ४ ॥

अर्थ:

एक ही रावण ने सब देवताओं को जीत लिया था, अब तो बहुत-से रावण हो गये हैं। इससे अब पहाड़ की गुफाओं का आश्रय लो। वहाँ ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभु की कुछ महिमा जानी थी।

छन्द

जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे। चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥ हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे। मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥

अर्थ:

जो प्रभु का प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे। वानरों ने शत्रुओं को सच्चा ही मान लिया। [इससे] सब वानर-भालू विचलित होकर हे कृपालु! रक्षा कीजिये! यों पुकारते हुए भय से व्याकुल होकर भाग चले। अत्यन्त बलवान् रणबाँकुरे हनुमानजी, अंगद, नील और नल लड़ते हैं और कपटरूपी भूमि से अंकुरों की भाँति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा रावणों को मसलते हैं॥

दोहा

सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस। सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस॥ ९६ ॥

अर्थ:

देवताओं और वानरों को विकल देखकर कोसलपति श्रीरामजी हँसे और शार्ङ्गधनुष पर एक बाण चढ़ाकर सभी रावणों को मार डाला।

दोहा 97 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी॥ रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु ने क्षण भर में सब माया काट डाली। जैसे सूर्य के उदय होते ही अन्धकार की राशि फट जाती है (नष्ट हो जाती है)। अब एक ही रावण को देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभु पर बहुत-से पुष्प बरसाये।

चौपाई

भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे॥ प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए॥ २ ॥

अर्थ:

श्री रघुनाथजी ने भुजा उठाकर सब वानरों को लौटाया। तब वे एक-एक को पुकार-पुकारकर लौट आये। प्रभु का बल पाकर रीछ-वानर दौड़ पड़े। जल्दी से कूदकर वे रणभूमि में आ गये।

चौपाई

अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें॥ सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल॥ ३ ॥

अर्थ:

देवताओं को श्रीरामजी की स्तुति करते देखकर रावण ने सोचा, मैं इनकी समझ में एक हो गया। [परन्तु इन्हें यह पता नहीं कि इनके लिये मैं एक ही बहुत हूँ] और कहा—अरे मूर्खो! तुम तो सदा के ही मेरे मरने वाले हो। ऐसा कहकर वह क्रोध करके आकाश पर [देवताओं की ओर] दौड़ा।

चौपाई

हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे॥ देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो॥ ४ ॥

अर्थ:

देवता हाहाकार करते हुए भागे। [रावण ने कहा—] दुष्टो! मेरे आगे से कहाँ जा सकोगे? देवताओं को व्याकुल देखकर अंगद दौड़े और उछलकर रावण का पैर पकड़कर [उसे] पृथ्वी पर गिरा दिया।