हनुमानजी का सुषेण वैद्य को लाना एवं संजीवनी के लिये जाना, कालनेमि-रावण-संवाद, मकरी-उद्धार, कालनेमि-उद्धार

हनुमानजी सुषेण वैद्य को ले आते हैं और संजीवनी लाने के लिए तुरंत प्रस्थान करते हैं। मार्ग में कालनेमि की माया का भेदन, मकरी का उद्धार और कालनेमि का अंत होता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण १४ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥ धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥ ४ ॥

अर्थ:

जाम्बवान ने कहा- लंका में सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आने के लिये किस को भेजा जाय? हनुमानजी छोटा रूप धरकर गये और सुषेण को उसके घर समेत तुरंत ही उठा लाये।

दोहा

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन। कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन॥ ५५ ॥

अर्थ:

सुषेण ने आकर श्रीरामजी के चरणारविन्दों में सिर नवाया। उसने पर्वत और औषधि का नाम बताया, (और कहा कि) हे पवनसुत! ओषधि लेने जाओ।

दोहा 56 के अंतर्गत
चौपाई

राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥ उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के चरणकमलों को हृदय में रखकर पवनपुत्र हनुमानजी अपना बल बखानकर (अर्थात्‌ मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर) चले। उधर एक गुप्तचर ने रावण को इस रहस्य की खबर दी। तब रावण कालनेमी के घर आया।

चौपाई

दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥ देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥ २ ॥

अर्थ:

रावण ने उसको सारा मर्म (हाल) बतलाया। कालनेमी ने सुना और बार-बार सिर पीटा (खेद प्रकट किया)। [उसने कहा--] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है ?।

चौपाई

भजु रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥ नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी का भजन करके तुम अपना कल्याण करो। हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नीलकमल के समान सुन्दर श्याम शरीर को अपने हृदय में रखो।

चौपाई

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं-तू ( भेद-भाव) और ममतारूपी मूढ़ता को त्यागो। महामोह (अज्ञान)-रूपी रात्रि में सो रहे हो, सो जाग उठो। जो कालरूपी सर्प का भी भक्षक है, कहीं स्वप्न में भी वह रण में जीता जा सकता है ?।

दोहा

सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार। राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥ ५६ ॥

अर्थ:

यह उसकी बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमी ने मन में विचार किया कि [इसके हाथ से मरने की अपेक्षा] श्रीरामजी के दूत के हाथ से ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पापसमूह में रत है।

दोहा 57 के अंतर्गत
चौपाई

अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥ मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम॥ १ ॥

अर्थ:

वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्ग में माया रची। तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया। हनुमानजी ने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनि से पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाए।

चौपाई

राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा॥ जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा॥ २ ॥

अर्थ:

राक्षस वहाँ कपट [से मुनि] का वेष बनाये विराजमान था। वह मायापति के दूत को मोहित करना चाहता था। मारुतसुत ने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्रीरामजी के गुणों की कथा कहने लगा।

चौपाई

होत महा रन रावन रामहिं। जितिहहिं राम न संसय या महिं॥ इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई। ग्यानदृष्टि बल मोहि अधिकाई॥ ३ ॥

अर्थ:

[वह बोला--] रावण और राममें महान्‌ युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे इसमें सन्देह नहीं है। हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टिका बहुत बड़ा बल है।

चौपाई

मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल॥ सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥ ४ ॥

अर्थ:

हनुमानजी ने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमानजी ने कहा--थोड़े जल से मैं तृप्त नहीं होने का। तब वह बोला--तालाब में स्नान करके तुरंत लौट आओ, तो मैं तुम्हें दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो।

दोहा

सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान। मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान॥ ५७ ॥

अर्थ:

तालाब में प्रवेश करते ही एक मगरी ने आकुल होकर उसी समय हनुमानजी का पैर पकड़ लिया। हनुमानजी ने उसे मार डाला। तब वह दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़कर आकाश को चली।

दोहा 58 के अंतर्गत
चौपाई

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा॥ मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा॥ १ ॥

अर्थ:

हे वानर! तुम्हारे दर्शन से मैं पापरहित हो गयी। हे तात! श्रेष्ठ मुनि का शाप मिट गया। हे कपि! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है। मेरा वचन सत्य मानो।

चौपाई

अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं॥ कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू॥ २ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गयी, त्यों ही हनुमानजी निशाचर के पास गये। हनुमानजी ने कहा--हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये। पीछे आप मुझे मन्त्र दीजियेगा।

चौपाई

सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥ राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना॥ ३ ॥

अर्थ:

हनुमानजी ने उसके सिर को पूँछ में लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह (उसके मुँह से राम-नाम का उच्चारण) सुनकर हनुमानजी मन में हर्षित होकर चले।

चौपाई

देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥ गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने पर्वत को देखा, पर औषध न पहचान सके। तब हनुमानजी ने एकदम से पर्वत को ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमानजी रात ही में आकाशमार्ग से दौड़ चले और अयोध्यापुरी के ऊपर पहुँच गये।