हनुमानजी का सुषेण वैद्य को लाना एवं संजीवनी के लिये जाना, कालनेमि-रावण-संवाद, मकरी-उद्धार, कालनेमि-उद्धार
हनुमानजी सुषेण वैद्य को ले आते हैं और संजीवनी लाने के लिए तुरंत प्रस्थान करते हैं। मार्ग में कालनेमि की माया का भेदन, मकरी का उद्धार और कालनेमि का अंत होता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण १४ / ३७
प्रकरण पाठ
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥ उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी के चरणकमलों को हृदय में रखकर पवनपुत्र हनुमानजी अपना बल बखानकर (अर्थात् मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर) चले। उधर एक गुप्तचर ने रावण को इस रहस्य की खबर दी। तब रावण कालनेमी के घर आया।
मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल॥ सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥ ४ ॥
अर्थ:
हनुमानजी ने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमानजी ने कहा--थोड़े जल से मैं तृप्त नहीं होने का। तब वह बोला--तालाब में स्नान करके तुरंत लौट आओ, तो मैं तुम्हें दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो।
सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥ राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना॥ ३ ॥
अर्थ:
हनुमानजी ने उसके सिर को पूँछ में लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह (उसके मुँह से राम-नाम का उच्चारण) सुनकर हनुमानजी मन में हर्षित होकर चले।