विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना और वानरों तथा भालुओं का उन्हें पहनना
विभीषण आभार स्वरूप वस्त्र और आभूषण बरसाते हैं। वानर और भालू उन्हें बड़े हर्ष और सरलता से धारण कर आनंदित होते हैं।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ३५ / ३७
प्रकरण पाठ
बहुरि बिभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥ लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥ २ ॥
अर्थ:
फिर विभीषणजी महल को गये और उन्होंने मणियों के समूहों (रत्नों) से और वस्त्रों से विमान को भर लिया। फिर उस पुष्पक विमान को लाकर प्रभु के सामने रखा। तब कृपासागर श्रीरामजी ने हँसकर कहा--।
जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं॥ हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता॥ ४ ॥
अर्थ:
जिसके मन को जो अच्छा लगता है, वह वही ले लेता है। मणियों को मुँह में लेकर वानर फिर उन्हें उगल देते हैं। यह तमाशा देखकर परम विनोदी और कृपा के धाम श्रीरामजी लक्ष्मणजी सहित हँसने लगे।
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं॥ देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा॥ ५ ॥
अर्थ:
प्रभु के (ऐसे) वचन सुनकर हम लाज के मारे मरे जा रहे हैं। कहीं मच्छर भी गरुड़ का हित कर सकते हैं? श्रीरामजी का रुख देखकर रीछ-वानर प्रेम में मग्र हो गये। उनकी घर जाने की इच्छा नहीं है।