कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति
कुंभकर्ण रणभूमि में प्रचंड पराक्रम दिखाता है और वानर सेना में हलचल मचा देता है। अंततः श्रीरामजी के हाथों उसका उद्धार होकर उसे परमगति प्राप्त होती है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण १८ / ३७
प्रकरण पाठ
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥ मुर्यो न मनु तनु टर्यो न टार्यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो॥ ३ ॥
अर्थ:
रीछ-वानर एक-एक बार में ही करोड़ों पहाड़ों के शिखरों से उस पर प्रहार करते हैं; परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा (विचलित हुआ) और न शरीर ही टला, जैसे मदार के फलों की मार से हाथी पर कुछ भी असर नहीं होता।
उमा करत रघुपति नरलीला। खेल गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥ भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥ १ ॥
अर्थ:
(शिवजी कहते हैं--) हे उमा! श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गरुड़ सर्पों के समूह में मिलकर खेलता हो। जो भौंह के इशारे मात्र से (बिना परिश्रम के) काल को भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है?
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं॥ मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा॥ २ ॥
अर्थ:
भगवान् [इसके द्वारा] जगत् को पवित्र करने वाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागर से तर जायेंगे। मूर्च्छा जाती रही, तब मारुति हनुमानजी जागे और फिर वे सुग्रीव को खोजने लगे।
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥ काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना॥ ३ ॥
अर्थ:
सुग्रीव की भी मूर्छा दूर हुई, तब वे [मुर्दे-से होकर] खिसक गये (काँख से नीचे गिर पड़े)। कुम्भकर्ण ने उनको मृतक जाना। उन्होंने कुम्भकर्ण के नाक-कान दाँतों से काट लिये और फिर गरजकर आकाश की ओर चले, तब कुम्भकर्ण ने जाना।
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा॥ पुनि आयउ प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना॥ ४ ॥
अर्थ:
उसने सुग्रीव का पैर पकड़कर उनको पृथ्वी पर पछाड़ दिया। फिर सुग्रीव ने बड़ी फुर्ती से उठकर उसको मारा। और तब बलवान सुग्रीव प्रभु के पास आये और बोले--कृपानिधान प्रभु की जय हो, जय हो, जय हो।
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥ सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥ ५ ॥
अर्थ:
नाक-कान काटे गये, ऐसा मन में जानकर बड़ी ग्लानि हुई; और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कान का होने से और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरों की सेना में भय उत्पन्न हो गया।
कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥ कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥ १ ॥
अर्थ:
रण के उत्साह में कुम्भकर्ण विरुद्ध होकर [उनके] सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह करोड़-करोड़ वानरों को एक साथ पकड़-पकड़कर खाने लगा। [वे उसके मुँह में इस तरह घुसने लगे] मानो पर्वत की गुफा में टिड्डियाँ समा रही हों।
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा॥ मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा॥ २ ॥
अर्थ:
करोड़ों (वानरों) को पकड़कर उसने शरीर से मसल डाला। करोड़ों को हाथों से मलकर पृथ्वी की धूल में मिला दिया। [पेट में गये हुए] भालू और वानरों के ठट्ट-के-ठट्ट उसके मुख, नाक और कानों की राह से निकल-निकलकर भाग रहे हैं।
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा॥ मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥ ३ ॥
अर्थ:
रण के मद में मत्त राक्षस कुम्भकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाता ने उसको सारा विश्व अर्पण कर दिया हो, और उसे वह ग्रास कर जायगा। सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाये भी नहीं लौटते। आँखों से उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारने से सुनते नहीं।
लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं॥ रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं॥ ४ ॥
अर्थ:
बाण लगते ही वे मेघ की तरह गरजते हैं। बहुत-से तो कठिन बाण को देखकर ही भाग जाते हैं। बिना मुण्ड (सिर) के प्रचण्ड रुण्ड (धड़) दौड़ रहे हैं और “पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो” का शब्द करते हुए गा (चिल्ला) रहे हैं।
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक॥ तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
फिर श्रीरघुनाथजी ने क्रोध करके धनुष को तानकर बहुत-से अत्यन्त भयानक बाण छोड़े। वे बाण कुम्भकर्ण के शरीर में घुसकर [पीछे से इस प्रकार] निकल जाते हैं [कि उनका पता नहीं चलता], जैसे बिजलियाँ बादल में समा जाती हैं।
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥ कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥ २ ॥
अर्थ:
[वे कहने लगे--] यह राक्षस दुर्भिक्ष के समान है, जो अब वानरकुलरूपी देश में पड़ना चाहता है। हे कृपारूपी जल के धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम! हे खर के शत्रु! हे शरणागत के दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये!
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥ धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा॥ ३ ॥
अर्थ:
वह सिर दसानन के आगे जा गिरा। उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणि के छूट जाने पर सर्प। प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धँसी जाती थी। तब प्रभु ने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये।
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर॥ तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना॥ ४ ॥
अर्थ:
वानर-भालू और निशाचरों को अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वी पर ऐसे पड़े जैसे आकाश से दो पहाड़ गिरे हों। उसका तेज प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के मुख में समा गया। [यह देखकर] देवता और मुनि सभी ने आश्चर्य माना।
गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए॥ बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए॥ ६ ॥
अर्थ:
आकाश के ऊपर से उन्होंने श्रीहरि के सुन्दर वीररसयुक्त गुण-समूह का गान किया, जो प्रभु के मन को बहुत ही भाया। मुनि यह कहकर चले गये कि अब दुष्ट रावण को शीघ्र मारिये। [उस समय] श्रीरामचन्द्रजी रणभूमि में आकर [अत्यन्त] सुशोभित हुए।
संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी। श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥ भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने। कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥
अर्थ:
अतुलनीय बल वाले कोसलपति श्रीरघुनाथजी रणभूमि में सुशोभित हैं। मुख पर पसीने की बूँदें हैं, कमल के समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं। शरीर पर रक्त के कण हैं, दोनों हाथों से धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु की इस छबि का वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते जिनके अनेक मुख हैं।
दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी॥ राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा॥ १ ॥
अर्थ:
दिन का अन्त होने पर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं। [आज के युद्ध में] योद्धाओं को बड़ी थकावट हुई; परन्तु श्रीरामजी की कृपा से वानरसेना का बल उसी प्रकार बढ़ गया जैसे घास पाकर आग बहुत बढ़ जाती है।