रावण का कुंभकर्ण को जगाना, कुंभकर्ण का रावण को उपदेश और विभीषण-कुंभकर्ण-संवाद

रावण कुंभकर्ण को जगाकर युद्ध के लिए प्रेरित करता है। कुंभकर्ण उसे कठोर सत्य सुनाता है और विभीषण से भी अर्थपूर्ण संवाद करता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण १७ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥ ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥ ३ ॥

अर्थ:

यह समाचार जब दशानन ने सुना, तब वह अत्यन्त विषाद से बार-बार सिर धुनने लगा। वह व्याकुल होकर कुम्भकर्ण के पास गया और अनेक उपाय करके उसे जगाया।

चौपाई

जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥ कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥ ४ ॥

अर्थ:

कुम्भकर्ण जागा। वह कैसा दिखायी देता है, मानो काल ही शरीर धारण करके बैठा हो। कुम्भकर्ण ने पूछा--हे भाई! कहो तो, तुम्हारा मुख सूख क्यों रहे हैं ?।

चौपाई

कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥ तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे॥ ५ ॥

अर्थ:

उस अभिमानी (रावण) ने उससे जिस प्रकार से वह सीता को हर लाया था [तबसे अबतक की] सारी कथा कही। [फिर कहा--] हे तात! वानरों ने सब राक्षस मार डाले; बड़े-बड़े योद्धाओं का भी संहार कर डाला।

चौपाई

दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी॥ अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥ ६ ॥

अर्थ:

दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्यभक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमि में मारे गए।

दोहा

सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥ ६२ ॥

अर्थ:

तब दशकंधर के वचन सुनकर कुम्भकर्ण बिलखकर (दुखी होकर) बोला--अरे मूर्ख! जगदंबा को हर लाकर अब तू कल्याण चाहता है ?।

दोहा 63 के अंतर्गत
चौपाई

भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥ अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥ १ ॥

अर्थ:

हे राक्षसराज! तूने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे क्या जगाया? हे तात! अब भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजी को भजो तो कल्याण होगा।

चौपाई

हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥ २ ॥

अर्थ:

हे रावण! जिनके हनुमान्-सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया।

चौपाई

कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा॥ ३ ॥

अर्थ:

हे स्वामी! तुमने उस परम देवता का विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनि ने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता; पर अब तो समय जाता रहा।

चौपाई

अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सुफल करौं मैं जाई॥ स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥ ४ ॥

अर्थ:

हे भाई! अब तो [अन्तिम बार] अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापों को छुड़ाने वाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामजी के जाकर दर्शन करूँ।

दोहा

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक। रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक॥ ६३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के रूप और गुणों को स्मरण करके वह एक क्षण के लिए प्रेम में मगन हो गया। फिर रावण ने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेक भैंसे मँगवाये।

दोहा 64 के अंतर्गत
चौपाई

महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना॥ कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥ १ ॥

अर्थ:

भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्रघात के समान गरजा। मद से चूर, रण के उत्साह से भरा कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली।

चौपाई

देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥ अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥ २ ॥

अर्थ:

उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणों पर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाई को उठाकर उसने हृदय से लगा लिया और श्रीरघुनाथजी का भक्त जानकर वे उसके मन को प्रिय लगे।

चौपाई

तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥ ३ ॥

अर्थ:

[विभीषण ने कहा--] हे तात! परम हितकर सलाह और विचार कहने पर रावण ने मुझे लात मारी। उसी ग्लानि के मारे मैं श्रीरघुनाथजी के पास चला आया। दीन देखकर प्रभु के मन को मैं [बहुत] प्रिय लगा।

चौपाई

सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥ धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥ ४ ॥

अर्थ:

[कुम्भकर्ण ने कहा--] हे पुत्र! सुन, रावण तो काल के वश हो गया है (उसके सिर पर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब परम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षसकुल का भूषण हो गया।

चौपाई

बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥ ५ ॥

अर्थ:

हे भाई! तूने अपने कुल को देदीप्यमान कर दिया, शोभा और सुख के सागर श्रीरामजी को भजकर।

दोहा

बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर। जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥ ६४ ॥

अर्थ:

मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजी का भजन करना। हे भाई! मैं काल के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ।