रावण का कुंभकर्ण को जगाना, कुंभकर्ण का रावण को उपदेश और विभीषण-कुंभकर्ण-संवाद
रावण कुंभकर्ण को जगाकर युद्ध के लिए प्रेरित करता है। कुंभकर्ण उसे कठोर सत्य सुनाता है और विभीषण से भी अर्थपूर्ण संवाद करता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण १७ / ३७
प्रकरण पाठ
तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥ ३ ॥
अर्थ:
[विभीषण ने कहा--] हे तात! परम हितकर सलाह और विचार कहने पर रावण ने मुझे लात मारी। उसी ग्लानि के मारे मैं श्रीरघुनाथजी के पास चला आया। दीन देखकर प्रभु के मन को मैं [बहुत] प्रिय लगा।
सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥ धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥ ४ ॥
अर्थ:
[कुम्भकर्ण ने कहा--] हे पुत्र! सुन, रावण तो काल के वश हो गया है (उसके सिर पर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब परम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षसकुल का भूषण हो गया।