त्रिजटा-सीता संवाद
अशोक वाटिका में त्रिजटा सीताजी को युद्ध के समाचार सुनाती है और उन्हें धैर्य बँधाती है। वह आश्वस्त करती है कि रामजी की विजय और मिलन अब निकट है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण २८ / ३७
प्रकरण पाठ
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई॥ मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौं हरि पद कमल बिछोही॥ ३ ॥
अर्थ:
श्री रघुनाथजी के बाणों से सिर कटने पर भी नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र उलटे ही कर रहा है। [सच बात तो यह है कि] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान् के चरण-कमलों से अलग कर दिया है।
रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी॥ ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना॥ ५ ॥
अर्थ:
जो श्री रघुनाथजी के विरह-रूपी बड़े विषैले बाणों से तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुःख में भी जो मेरे प्राणों को रख रहा है, वही विधाता उस (रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं।
एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है। मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है॥ सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा। अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा॥
अर्थ:
[वे यही सोचकर रह जाते हैं कि] इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हृदय में मेरा निवास है और मेरे उदर में अनेकों भुवन हैं। अतः रावण के हृदय में बाण लगते ही सब भुवनों का नाश हो जायगा। यह वचन सुनकर, सीताजी के मन में अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ देखकर त्रिजटाने फिर कहा—हे सुन्दरी! महान् सन्देह का त्याग कर दो; अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा—॥
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती॥ करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी॥ २ ॥
अर्थ:
वे रात्रि और चन्द्रमा की बहुत प्रकार से निन्दा कर रही हैं [और कह रही हैं--] रात युग के समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकीजी श्रीरामजी के विरह में दुःखी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं।
धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा। अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा॥ बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो। चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो॥
अर्थ:
विकट और विकराल वानर-भालू हाथों में पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं। उनके मारने से राक्षस भाग चले। बलवान वानरों ने शत्रु की सेना को विचलित करके फिर रावण को घेर लिया। चारों ओर से चपेटें मारकर और नखों से शरीर विदीर्ण कर वानरों ने उसे व्याकुल कर दिया॥।