त्रिजटा-सीता संवाद

अशोक वाटिका में त्रिजटा सीताजी को युद्ध के समाचार सुनाती है और उन्हें धैर्य बँधाती है। वह आश्वस्त करती है कि रामजी की विजय और मिलन अब निकट है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २८ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई॥ सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी॥ १ ॥

अर्थ:

उसी रात त्रिजटा ने सीताजी के पास जाकर उन्हें सब कथा कह सुनायी। शत्रु के सिर और भुजाओं की बढ़ती का संवाद सुनकर सीताजी के हृदय में बड़ा भय हुआ।

चौपाई

मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता॥ होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता॥ २ ॥

अर्थ:

मुँह म्लान हो गया, मन में चिन्ता उत्पन्न हो गयी। तब सीताजी त्रिजटा से बोलीं— हे माता! बताती क्यों नहीं? क्या होगा? सम्पूर्ण विश्व को दुःख देनेवाला यह किस प्रकार मरेगा ?

चौपाई

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई॥ मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौं हरि पद कमल बिछोही॥ ३ ॥

अर्थ:

श्री रघुनाथजी के बाणों से सिर कटने पर भी नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र उलटे ही कर रहा है। [सच बात तो यह है कि] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान् के चरण-कमलों से अलग कर दिया है।

चौपाई

जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा॥ जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए॥ ४ ॥

अर्थ:

जिसने कपट का झूठा स्वर्णमृग बनाया था, वही दैव अब भी मुझ पर रूठा हुआ है। जिस विधाता ने मुझसे दुःसह दुःख सहन कराये और लक्ष्मण को कड़ुवे वचन कहलाये,

चौपाई

रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी॥ ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना॥ ५ ॥

अर्थ:

जो श्री रघुनाथजी के विरह-रूपी बड़े विषैले बाणों से तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुःख में भी जो मेरे प्राणों को रख रहा है, वही विधाता उस (रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं।

चौपाई

बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की॥ कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी॥ ६ ॥

अर्थ:

कृपानिधान श्रीरामजी की याद कर-करके जानकीजी बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं। त्रिजटा ने कहा— हे राजकुमारी! सुनो, देवताओं का शत्रु रावण हृदय में बाण लगते ही मर जायगा।

चौपाई

प्रभु ताते उर हतइ न तेही। एहि के हृदयँ बसति बैदेही॥ ७ ॥

अर्थ:

परन्तु प्रभु उसके हृदय में बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदय में जानकीजी (आप) बसती हैं।

छन्द

एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है। मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है॥ सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा। अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा॥

अर्थ:

[वे यही सोचकर रह जाते हैं कि] इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हृदय में मेरा निवास है और मेरे उदर में अनेकों भुवन हैं। अतः रावण के हृदय में बाण लगते ही सब भुवनों का नाश हो जायगा। यह वचन सुनकर, सीताजी के मन में अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ देखकर त्रिजटाने फिर कहा—हे सुन्दरी! महान् सन्देह का त्याग कर दो; अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा—॥

दोहा

काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान। तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान॥ ९९ ॥

अर्थ:

सिरों के बार-बार काटे जाने से जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदय से तुम्हारा ध्यान छूट जायगा, तब सुजान (अन्तर्यामी) श्रीरामजी रावण के हृदय में बाण मारेंगे।

दोहा 100 के अंतर्गत
चौपाई

अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई॥ राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर और सीताजी को बहुत प्रकार से समझाकर फिर त्रिजटा अपने भवन चली गयी। श्रीरामचन्द्रजी के स्वभाव का स्मरण करके जानकीजी को अत्यन्त विरह-व्यथा उत्पन्न हुई।

चौपाई

निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती॥ करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी॥ २ ॥

अर्थ:

वे रात्रि और चन्द्रमा की बहुत प्रकार से निन्दा कर रही हैं [और कह रही हैं--] रात युग के समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकीजी श्रीरामजी के विरह में दुःखी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं।

चौपाई

जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू॥ सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा॥ ३ ॥

अर्थ:

जब विरह के मारे हृदय में दारुण दाह हो गया, तब उनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़क उठे। शकुन समझकर उन्होंने मन में धैर्य धारण किया कि अब कृपालु श्रीरघुवीर अवश्य मिलेंगे।

चौपाई

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा॥ सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥ ४ ॥

अर्थ:

यहाँ आधी रात को रावण जागा और अपने सारथि पर रुष्ट होकर कहने लगा-- ओरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमि से अलग कर दिया। अरे अधम! अरे मन्दबुद्धि! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है!

चौपाई

तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भोरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा॥ सुनि आगवनु दसानन केरा। कपि दल खरभर भयउ घनेरा॥ ५ ॥

अर्थ:

सारथि ने चरण पकड़कर रावण को बहुत प्रकार से समझाया। सबेरा होते ही वह रथ पर चढ़कर फिर दौड़ा। रावण का आना सुनकर वानरों की सेना में बड़ी खलबली मच गयी।

चौपाई

जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाइ भट भारी॥ ६ ॥

अर्थ:

वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँ से पर्वत और वृक्ष उखाड़कर [क्रोध से] दाँत कटकटाकर दौड़े।

छन्द

धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा। अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा॥ बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो। चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो॥

अर्थ:

विकट और विकराल वानर-भालू हाथों में पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं। उनके मारने से राक्षस भाग चले। बलवान वानरों ने शत्रु की सेना को विचलित करके फिर रावण को घेर लिया। चारों ओर से चपेटें मारकर और नखों से शरीर विदीर्ण कर वानरों ने उसे व्याकुल कर दिया॥।

दोहा

देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार। अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार॥ १०० ॥

अर्थ:

वानरों को बड़ा ही प्रबल देखकर रावण ने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभर में उसने माया फैलाई।