मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि क्रिया
रावण के पतन पर मन्दोदरी गहन शोक करती है और उसके अहंकार के दुष्परिणाम को पहचानती है। रामजी की आज्ञा से विभीषण विधिपूर्वक उसकी अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न करते हैं।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ३० / ३७
प्रकरण पाठ
तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥ सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥ ३ ॥
अर्थ:
हे नाथ! तुम्हारे बल से पृथ्वी सदा काँपती रहती थी। अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे। शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूल में भरा हुआ पृथ्वी पर पड़ा है!।
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥ भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥ ४ ॥
अर्थ:
वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु, इनमें से किसी ने भी रण में तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुजबल से काल और यमराज को भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथ की तरह पड़े हो।
जगत बिदित तुम्हारि प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई॥ राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा॥ ५ ॥
अर्थ:
तुम्हारी प्रभुता जगत भर में प्रसिद्ध है। तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियों के बल का हाय! वर्णन ही नहीं हो सकता। श्रीरामचन्द्रजी के विमुख होने से ही तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुल में कोई रोनेवाला भी न रह गया।
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥ अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं॥ ६ ॥
अर्थ:
हे नाथ! विधाता की सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे। किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं। रामविमुख के लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है (अर्थात् उचित ही है)।
जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं। जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं॥ आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं। तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं॥
अर्थ:
दैत्यरूपी वन को जलाने के लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरि को तुमने मनुष्य करके जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान् को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा। आजन्म से परद्रोहरत पापौघमय तुम्हारा यह तन रहा! इतने पर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजी ने तुम्हें अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ॥।
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा॥ लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो॥ ३ ॥
अर्थ:
उन्होंने भाई की दशा देखकर दुःख किया। तब प्रभु श्रीरामजी ने छोटे भाई को आज्ञा दी [कि जाकर विभीषण को थैर्य बँधाओ]। लक्ष्मणजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया तब विभीषण प्रभु के पास लौट आये।
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका॥ कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी॥ ४ ॥
अर्थ:
प्रभु ने उनको कृपापूर्ण दृष्टि से देखा [और कहा--] सब शोक त्यागकर रावण की अन्त्येष्टि क्रिया करो। प्रभु की आज्ञा मानकर और हृदय में देश और काल का विचार करके विभीषणजी ने विधिपूर्वक सब क्रिया की।