मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि क्रिया

रावण के पतन पर मन्दोदरी गहन शोक करती है और उसके अहंकार के दुष्परिणाम को पहचानती है। रामजी की आज्ञा से विभीषण विधिपूर्वक उसकी अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न करते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ३० / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥ जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आईं॥ १ ॥

अर्थ:

पति का सिर देखते ही मन्दोदरी व्याकुल और मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ी। स्त्रियाँ रोती हुई उठ दौड़ीं और उसे उठाकर रावण के पास आयीं।

चौपाई

पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा॥ उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना॥ २ ॥

अर्थ:

पति की गति देखकर वे पुकार-पुकारकर रोने लगीं। केश खुल गये, देह की सँभाल नहीं रही। वे अनेक प्रकार से छाती पीटती हैं और रोती हुई रावण के प्रताप का बखान करती हैं।

चौपाई

तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥ सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! तुम्हारे बल से पृथ्वी सदा काँपती रहती थी। अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे। शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूल में भरा हुआ पृथ्वी पर पड़ा है!।

चौपाई

बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥ भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु, इनमें से किसी ने भी रण में तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुजबल से काल और यमराज को भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथ की तरह पड़े हो।

चौपाई

जगत बिदित तुम्हारि प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई॥ राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा॥ ५ ॥

अर्थ:

तुम्हारी प्रभुता जगत भर में प्रसिद्ध है। तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियों के बल का हाय! वर्णन ही नहीं हो सकता। श्रीरामचन्द्रजी के विमुख होने से ही तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुल में कोई रोनेवाला भी न रह गया।

चौपाई

तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥ अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं॥ ६ ॥

अर्थ:

हे नाथ! विधाता की सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे। किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं। रामविमुख के लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है (अर्थात् उचित ही है)।

चौपाई

काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना॥ ७ ॥

अर्थ:

हे पति! काल के पूर्ण वश में होने से तुमने [किसी का] कहना नहीं माना और चराचर के नाथ परमात्मा को मनुष्य करके जाना।

छन्द

जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं। जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं॥ आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं। तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं॥

अर्थ:

दैत्यरूपी वन को जलाने के लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरि को तुमने मनुष्य करके जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान् को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा। आजन्म से परद्रोहरत पापौघमय तुम्हारा यह तन रहा! इतने पर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजी ने तुम्हें अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ॥।

दोहा

अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन। जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान॥ १०४ ॥

अर्थ:

अहह ! नाथ! श्रीरघुनाथजी के समान कृपासिंधु दूसरा कोई नहीं है, जिन्होंने तुमको वह गति दी जो योगि बृंद को भी दुर्लभ है।

दोहा 105 के अंतर्गत
चौपाई

मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना॥ अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी॥ १ ॥

अर्थ:

मन्दोदरी के वचन कानों से सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभी ने सुख माना। ब्रह्मा, महादेव, नारद और सनकादि, तथा जो मुनिवर परमार्थवादी थे।

चौपाई

भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी॥ रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी॥ २ ॥

अर्थ:

वे सभी श्रीरघुनाथजी को नेत्र भरकर निरखकर प्रेम मगन हो गये और अत्यन्त सुखी हुए। अपने घर की सब स्त्रियों को रोती हुई देखकर विभीषणजी के मन में बड़ा भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गये।

चौपाई

बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा॥ लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्होंने भाई की दशा देखकर दुःख किया। तब प्रभु श्रीरामजी ने छोटे भाई को आज्ञा दी [कि जाकर विभीषण को थैर्य बँधाओ]। लक्ष्मणजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया तब विभीषण प्रभु के पास लौट आये।

चौपाई

कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका॥ कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रभु ने उनको कृपापूर्ण दृष्टि से देखा [और कहा--] सब शोक त्यागकर रावण की अन्त्येष्टि क्रिया करो। प्रभु की आज्ञा मानकर और हृदय में देश और काल का विचार करके विभीषणजी ने विधिपूर्वक सब क्रिया की।

दोहा

मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि। भवन गईं रघुपति गुन गन बरनत मन माहि॥ १०५ ॥

अर्थ:

मन्दोदरी आदि सब स्त्रियाँ उसे (रावण को) तिलांजलि देकर मन में श्रीरघुनाथजी के गुण-समूहों का वर्णन करती हुई भवन को गयीं।