श्रीरामजी के बाण से रावण के मुकुट और छत्रादि का गिरना
श्रीरामजी का बाण रावण के मुकुट और छत्रादि को भूमि पर गिरा देता है। इस लीला से रावण के अभिमान को गहरी चोट पहुँचती है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ६ / ३७
प्रकरण पाठ
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी॥ मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका॥ ३ ॥
अर्थ:
रावण ने सिर पर मेघडंबर (बादलों के डंबर-जैसा विशाल और काला) छत्र धारण कर रखा है। वही मानो बादलों की अत्यन्त काली घटा है। मन्दोदरी के कानों में जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो ! वही मानो बिजली चमक रही है।
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी॥ १ ॥
अर्थ:
न भूकम्प हुआ, न बहुत जोर की हवा (आँधी) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रों से देखा। [फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े ?] सभी अपने-अपने हृदय में सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ !