श्रीरामजी के बाण से रावण के मुकुट और छत्रादि का गिरना

श्रीरामजी का बाण रावण के मुकुट और छत्रादि को भूमि पर गिरा देता है। इस लीला से रावण के अभिमान को गहरी चोट पहुँचती है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ६ / ३७

प्रकरण पाठ

दोहा

पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान॥ १२ (ख) ॥

अर्थ:

पवनपुत्र हनुमानजी के वचन सुनकर सुजान श्रीरामजी हँसे। फिर दक्षिणी ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले--।

दोहा 13 के अंतर्गत
चौपाई

देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घमंड दामिनी बिलासा॥ मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥ १ ॥

अर्थ:

हे विभीषण ! दक्षिण दिशा की ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे (हलके-हलके) स्वर से गरज रहा है। कहीं कठोर ओलों की वर्षा न हो !

चौपाई

कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला॥ लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा॥ २ ॥

अर्थ:

विभीषण बोले--हे कृपालु ! सुनिये, यह न तो बिजली है, न बादलों की घटा। लंका की चोटी पर एक महल है। दशग्रीव रावण वहाँ [नाच-गान का] अखाड़ा देख रहा है।

चौपाई

छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी॥ मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका॥ ३ ॥

अर्थ:

रावण ने सिर पर मेघडंबर (बादलों के डंबर-जैसा विशाल और काला) छत्र धारण कर रखा है। वही मानो बादलों की अत्यन्त काली घटा है। मन्दोदरी के कानों में जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो ! वही मानो बिजली चमक रही है।

चौपाई

बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा॥ प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना॥ ४ ॥

अर्थ:

हे देवताओं के सम्राट् ! सुनिये, अनुपम ताल और मृदंग बज रहे हैं। वही मधुर [गर्जन] ध्वनि है। रावण का अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये। उन्होंने धनुष चढ़ाकर उस पर बाण का सन्धान किया।

दोहा

छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान। सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥ १३ (क) ॥

अर्थ:

और एक ही बाण से [रावण के] छत्र-मुकुट और [मन्दोदरी के] कर्णफूल काट गिराये। सब के देखते-देखते वे जमीन पर आ पड़े, पर इसका भेद (कारण) किसी ने नहीं जाना।

दोहा

अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग॥ १३ (ख) ॥

अर्थ:

ऐसा कौतुक करके श्रीरामजी का बाण [वापस] आकर [फिर] तरकस में जा घुसा। यह महान् रस-भंग (रंग में भंग) देखकर रावण की सारी सभा भयभीत हो गयी।

दोहा 14 के अंतर्गत
चौपाई

कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी॥ १ ॥

अर्थ:

न भूकम्प हुआ, न बहुत जोर की हवा (आँधी) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रों से देखा। [फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े ?] सभी अपने-अपने हृदय में सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ !

चौपाई

दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई॥ सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही॥ २ ॥

अर्थ:

सभा को भयभीत देखकर रावण ने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे- सिरों का गिरना भी जिसके लिये निरन्तर शुभ होता रहा है, उसके लिये मुकुट का गिरना अपशगुन कैसा ?