श्रीरामजी की प्रलापलीला, हनुमानजी का लौटना, लक्ष्मणजी का उठ बैठना

लक्ष्मणजी की दशा देखकर श्रीरामजी करुण प्रलाप करते हैं। तभी हनुमानजी लौटते हैं, औषधि का प्रभाव होता है और लक्ष्मणजी उठ बैठते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण १६ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥ अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ॥ १ ॥

अर्थ:

वहाँ लक्ष्मणजी को देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्यों के अनुसार वचन बोले-- आधी रात बीत चुकी है, हनुमान नहीं आया। यह कहकर श्रीरामजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को उठाकर हृदय से लगा लिया।

चौपाई

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥ मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥ २ ॥

अर्थ:

आप मुझे कभी दुःखी देखकर सह नहीं सकते थे। भाई! आपका स्वभाव सदा कोमल रहा है। मेरे हित के लिए तुमने माता-पिता को छोड़ दिया और वन में जाड़ा, धूप, गरमी और हवा सब सहा।

चौपाई

सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई॥ जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥ ३ ॥

अर्थ:

हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुल वचन सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं जानता कि वन में भाई का विछोह होगा तो मैं पिता का वचन भी न मानता।

चौपाई

सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥ अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥ ४ ॥

अर्थ:

पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार--ये जगत में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदय में ऐसा विचारकर हे तात! जागो।

चौपाई

जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥ अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥ ५ ॥

अर्थ:

जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं, हे भाई। यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा।

चौपाई

जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥ ६ ॥

अर्थ:

स्त्री के लिए प्रिय भाई को खोकर मैं अवध किस मुँह से जाऊँगा? मैं जगत में बदनामी भले ही सह लेता। स्त्री की हानि से विशेष क्षति नहीं है।

चौपाई

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥ निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा॥ ७ ॥

अर्थ:

अब तो हे पुत्र! मेरा निष्ठुर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा। हे तात! तुम अपनी माता के एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो।

चौपाई

सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥ उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई॥ ८ ॥

अर्थ:

सब प्रकार से सुखद और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंप दिया था। मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे क्यों नहीं समझाते?

चौपाई

बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥ उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥ ९ ॥

अर्थ:

सोच से छुड़ानेवाले श्रीरामजी बहुत प्रकार से सोच कर रहे हैं। उनके कमल-दल के समान नेत्रों से [विषाद के आँसुओं का] जल बह रहा है। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! श्रीरघुराई एक (अद्वितीय) और अखण्ड (वियोगरहित) हैं। भक्तों पर कृपा करनेवाले भगवान् ने [लीला करके] मनुष्य की गति दिखाई है।

सोरठा

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर। आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥ ६१ ॥

अर्थ:

प्रभु के [लीलाके लिये किये गये] प्रलाप को कानों से सुनकर वानरों के समूह व्याकुल हो गए। [इतने में ही] हनुमानजी आ गए, जैसे करुणा में वीर रस का उदय हो जाता है।

दोहा 62 के अंतर्गत
चौपाई

हरषि राम भेटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥ तुरत बैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी हर्षित होकर हनुमानजी से गले लगे। प्रभु परम सुजान (चतुर) और अत्यन्त ही कृतज्ञ हैं। तब वैद्य ने तुरंत उपाय किया, [जिससे] लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे।

चौपाई

हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥ कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु भाई को हृदय से लगाकर मिले। भालू और वानरों के समूह सब हर्षित हो गए। फिर हनुमानजी ने वैद्य को उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया जिस प्रकार वे उस बार उसे ले आए थे।