मेघनाद का युद्ध, रामजी का लीला से नागपाश में बँधना

मेघनाद मायावी युद्ध करता है और लीला से रामजी को नागपाश में बाँध देता है। यह दृश्य देवताओं और वानर सेना में क्षणिक विषाद उत्पन्न करता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण १९ / ३७

प्रकरण पाठ

दोहा

मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास। गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥ ७२ ॥

अर्थ:

मेघनाद उसी (पूर्वोक्त) मायामय रथ पर चढ़कर आकाश में चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरों की सेना में भय छा गया।

दोहा 73 के अंतर्गत
चौपाई

सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना॥ डारइ परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना॥ १ ॥

अर्थ:

वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र, शस्त्र एवं वज्रायुध आदि बहुत-से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत-से बाणों की वृष्टि करने लगा।

चौपाई

दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥ धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥ २ ॥

अर्थ:

आकाश में दसों दिशाओं में बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्र के बादलों ने झड़ी लगा दी हो। “पकड़ो, पकड़ो, मारो” ये शब्द कानों से सुनायी पड़ते हैं। पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता।

चौपाई

गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥ अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥ ३ ॥

अर्थ:

पर्वत और वृक्षों को लेकर वानर आकाश में दौड़ते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुखी होकर लौट आते हैं-मेघनाद ने मायाबल से अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओं को बाणों के पिंजरे बना दिये (बाणों से छा दिया)।

चौपाई

जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर॥ मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला॥ ४ ॥

अर्थ:

अब कहाँ जाय, यह सोचकर (रास्ता न पाकर) वानर व्याकुल हो गये। मानो पर्वत इन्द्र की कैद में पड़े हों। मेघनाद ने मारुतसुत हनुमान, अंगद, नल और नील आदि सभी बलवानों को व्याकुल कर दिया।

चौपाई

पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन॥ पुनि रघुपति सैं जूझै लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥ ५ ॥

अर्थ:

फिर उसने लक्ष्मणजी, सुग्रीव और विभीषण को बाणों से मारकर उनके शरीरों को चलनी कर दिया। फिर वह श्रीरघुनाथजी से लड़ने लगा। वह जो बाण छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं।

चौपाई

ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥ नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥ ६ ॥

अर्थ:

जो स्वतन्त्र, अनन्त, एक (अखण्ड) और निर्विकार हैं, वे खरके शत्रु श्रीरामजी [लीलासे] नागपाश के वश में हो गये (उससे बँध गये)। श्रीरामचन्द्रजी सदा स्वतन्त्र, एक (अद्वितीय) भगवान् हैं। वे नट की तरह अनेकों प्रकार के दिखावटी चरित्र करते हैं।

चौपाई

रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो॥ ७ ॥

अर्थ:

रण की शोभा के लिये प्रभु ने अपने को नागपाश में बँधा लिया; किन्तु उससे देवताओं को बड़ा भय हुआ।

दोहा

गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास। सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥ ७३ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-मृत्यु) की फाँसी को काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्वनिवास (विश्व के आधार) प्रभु कहीं बंधन में आ सकते हैं ?

दोहा 74 के अंतर्गत
चौपाई

चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥ अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी॥ १ ॥

अर्थ:

हे भवानी! श्रीरामजी की इन सगुण लीलाओं के विषय में बुद्धि और वाणी के बल से तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता। ऐसा विचार कर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्रीरामजी का भजन ही करते हैं।

चौपाई

ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा॥ जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा॥ २ ॥

अर्थ:

मेघनाद ने कटक को व्याकुल कर दिया। फिर वह प्रगट हो गया और दुर्बाद कहने लगा। इस पर जामवंत ने कहा—अरे खल! खड़ा रह। यह सुनकर उसे क्रोध अति बढ़ा।

चौपाई

बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही॥ अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो॥ ३ ॥

अर्थ:

अरे मूर्ख! मैंने बूढ़ा जानकर तुझे छोड़ दिया था। अरे अधम! अब तू मुझे ललकारने लगा है? ऐसा कहकर उसने चमकता हुआ त्रिशूल चलाया। जामवंत ने उसी त्रिशूल को हाथ से पकड़कर दौड़ा।

चौपाई

मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती॥ पुनि रिसान गहि चरन फिरायो। महि पछारि निज बल देखरायो॥ ४ ॥

अर्थ:

उसने मेघनाद की छाती पर वार किया। वह देवताओं का शत्रु चक्कर खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर क्रोध में भरकर उसने पैर पकड़कर उसे घुमाया और पृथ्वी पर पछाड़कर अपना बल दिखाया।

चौपाई

बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा॥ इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो॥ ५ ॥

अर्थ:

[किन्तु] वरदान के प्रताप से वह मारे नहीं मरता। तब जामवंत ने उसका पैर पकड़कर उसे लंका पर फेंक दिया। इहाँ देवर्षि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो।

दोहा

खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ। माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ॥ ७४ (क) ॥

अर्थ:

पक्षिराज गरुड़जी सब माया-नाग बरूथ को पकड़कर खा गये। माया से रहित होकर सब वानरों के झुंड हर्षित हुए।

दोहा

गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ। चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ॥ ७४ (ख) ॥

अर्थ:

पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नख धारण किए वानर क्रोधित होकर दौड़े। निशाचर व्याकुल होकर भाग चले और भागकर गढ़ पर चढ़ गये।

दोहा 75 के अंतर्गत
चौपाई

मेघनाद कै मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी॥ तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा॥ १ ॥

अर्थ:

मेघनाद की मूर्छा जागी, [तब] पिता को देखकर उसे अति लाज लगी। तुरंत वह गिरिवर की कंदरा में गया। मैं अजय (अजेय होनेको) यज्ञ करूँ, ऐसा मन में धारण किया।

चौपाई

इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा॥ मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन॥ २ ॥

अर्थ:

यहाँ विभीषण ने मंत्र विचार किया [और श्रीरामचन्द्रजी से कहा--] हे अतुल बल वाले उदार नाथ! देवताओं को सताने वाला खल, मायावी मेघनाद अपावन यज्ञ कर रहा है।

चौपाई

जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि॥ सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना॥ ३ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! यदि वह सिद्ध हो पायेगा तो हे नाथ! फिर जल्दी जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीरघुपति ने बहुत सुख माना और अंगदादि अनेक वानरों से बोले।

चौपाई

लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई॥ तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही॥ ४ ॥

अर्थ:

हे भाइयो! सब लोग लक्ष्मण के साथ जाओ और जाकर यज्ञ का विध्वंस करो। हे लक्ष्मण! संग्राम में तुम उसे मारना। देवताओं को भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है।

चौपाई

मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई॥ जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन॥ ५ ॥

अर्थ:

हे भाई! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धि के उपाय से मारना, जिससे निशाचर का नाश हो। हे जामवंत, सुग्रीव, विभीषण! तुम तीनों जन सेना समेत रहना।

चौपाई

जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन॥ प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा॥ ६ ॥

अर्थ:

जब श्रीरघुवीर ने आज्ञा दी, तब कमर में निषंग कसकर और सरासन सजाकर रणधीर श्रीलक्ष्मणजी प्रभु के प्रताप को हृदय में धारण करके मेघ के समान गम्भीर वाणी बोले।

चौपाई

जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं॥ जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई॥ ७ ॥

अर्थ:

यदि मैं आज उसे बिना मारे आऊँ, तो श्रीरघुनाथजी का सेवक न कहलाऊँ। यदि सौ शंकर भी उसकी सहायता करें, तब भी श्रीरघुवीर की दुहाई है; आज मैं उसे मार ही डालूँगा।

दोहा

रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत। अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत॥ ७५ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी के चरणों में सिर नवाकर तुरंत चले। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान आदि सुभट थे।