मेघनाद का युद्ध, रामजी का लीला से नागपाश में बँधना
मेघनाद मायावी युद्ध करता है और लीला से रामजी को नागपाश में बाँध देता है। यह दृश्य देवताओं और वानर सेना में क्षणिक विषाद उत्पन्न करता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण १९ / ३७
प्रकरण पाठ
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥ अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥ ३ ॥
अर्थ:
पर्वत और वृक्षों को लेकर वानर आकाश में दौड़ते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुखी होकर लौट आते हैं-मेघनाद ने मायाबल से अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओं को बाणों के पिंजरे बना दिये (बाणों से छा दिया)।
ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥ नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥ ६ ॥
अर्थ:
जो स्वतन्त्र, अनन्त, एक (अखण्ड) और निर्विकार हैं, वे खरके शत्रु श्रीरामजी [लीलासे] नागपाश के वश में हो गये (उससे बँध गये)। श्रीरामचन्द्रजी सदा स्वतन्त्र, एक (अद्वितीय) भगवान् हैं। वे नट की तरह अनेकों प्रकार के दिखावटी चरित्र करते हैं।
चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥ अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी॥ १ ॥
अर्थ:
हे भवानी! श्रीरामजी की इन सगुण लीलाओं के विषय में बुद्धि और वाणी के बल से तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता। ऐसा विचार कर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्रीरामजी का भजन ही करते हैं।