रावण का युद्ध के लिये प्रस्थान, श्रीरामजी का विजय रथ और वानर-राक्षसों का युद्ध

रावण स्वयं युद्ध के लिए प्रस्थान करता है और उधर श्रीरामजी के विजय रथ का महात्म्य प्रकट होता है। वानर और राक्षसों के बीच संग्राम और अधिक उग्र हो उठता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २१ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा॥ बिबिधि भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना॥ १ ॥

अर्थ:

राक्षसों की अपार सेना चली। चतुरंगिणी सेना की बहुत-सी टुकड़ियाँ हैं। अनेकों प्रकार के वाहन, रथ और सवारियाँ हैं तथा बहुत-से रंगों की अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं।

चौपाई

चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे॥ बरन बरन बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया॥ २ ॥

अर्थ:

मतवाले हाथियों के बहुत-से झुंड चले। मानो पवन से प्रेरित हुए वर्षा ऋतु के बादल हों। रंग-बिरंगे वीरों के समूह हैं, जो युद्ध में बड़े शूरवीर हैं और बहुत प्रकार की माया जानते हैं।

चौपाई

अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी॥ चलत कटक दिगसिंधुर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

अत्यन्त विचित्र फौज शोभित है। मानो वीर वसन्त ने सेना सजायी हो। सेना के चलने से दिशाओं के हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुब्ध हो गये और पर्वत डगमगाने लगे।

चौपाई

उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई॥ पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं॥ ४ ॥

अर्थ:

इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये। [फिर सहसा] पवन रुक गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े भीषण ध्वनि से बज रहे हैं; जैसे प्रलयकाल के बादल गरज रहे हों।

चौपाई

भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई॥ केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

भेरी, नफीरी (तुरही) और शहनाईमें योद्धाओंको सुख देनेवाला मारू राग बज रहा है। सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने-अपने बल-पौरुषका बखान कर रहे हैं।

चौपाई

कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा॥ हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई॥ ६ ॥

अर्थ:

रावण ने कहा—हे उत्तम योद्धाओ! सुनो। तुम रीछ-वानरों के ठट्टों को मसल डालो। और मैं दोनों भाइयों को मारूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी सेना सामने चलायी।

चौपाई

यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई॥ ७ ॥

अर्थ:

जब सब वानरों ने यह खबर पायी, तब वे श्रीरघुवीर की दुहाई देते हुए दौड़े।

छन्द

धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते। मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते॥ नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं। जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं॥

अर्थ:

वे विशाल और काल के समान कराल वानर-भालू दौड़े। मानो पंखवाले पर्वतों के समूह उड़ रहे हों। वे अनेक वर्णों के हैं। नख, दाँत, पर्वत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बड़े बलवान् हैं और किसी का भी डर नहीं मानते। रावणरूपी मतवाले हाथी के लिये सिंहरूप श्रीरामजी का जय-जयकार करके वे उनके सुन्दर यश का बखान करते हैं॥

दोहा

दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि। भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि॥ ७९ ॥

अर्थ:

दोनों ओर के योद्धा जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी जानकर इधर श्रीरघुनाथजी का और उधर रावण का बखान करके परस्पर भिड़ गये।

दोहा 80 के अंतर्गत
चौपाई

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥ अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥ १ ॥

अर्थ:

रावण को रथ पर और श्रीरघुवीर को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गये। प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया [कि वे बिना रथ के रावण को कैसे जीत सकेंगे]। श्रीरामजी के चरणों की वन्दना करके वे स्नेहपूर्वक कहने लगे।

चौपाई

नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा? कृपानिधान श्रीरामजी ने कहा--हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है।

चौपाई

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥ बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥ ३ ॥

अर्थ:

शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिये हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इन्द्रियों का वश में होना) और परोपकार--ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं।

चौपाई

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥ दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥ ४ ॥

अर्थ:

ईश्वर का भजन ही [उस रथ को चलाने वाला] चतुर सारथि है। वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है।

चौपाई

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥ कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥ ५ ॥

अर्थ:

निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), [अहिंसादि] यम और [शौचादि] नियम--ये बहुत-से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है।

चौपाई

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥ ६ ॥

अर्थ:

हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो, उसके लिए जीतने को कहीं शत्रु ही नहीं है।

दोहा

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥ ८० (क) ॥

अर्थ:

हे धीरबुद्धिवाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु) रूपी महान दुर्जय शत्रु को भी जीत सकता है [रावण की तो बात ही क्या है]।

दोहा

सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज। एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥ ८० (ख) ॥

अर्थ:

प्रभु के वचन सुनकर विभीषणजी ने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये [और कहा--] हे कृपा और सुख के समूह श्रीरामजी! आपने इसी बहाने मुझे [महान्] उपदेश दिया।

दोहा

उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान। लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन॥ ८० (ग) ॥

अर्थ:

उधर से रावण ललकार रहा है और इधर से अंगद और हनुमानजी। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामी की दुहाई देकर लड़ रहे हैं।

दोहा 81 के अंतर्गत
चौपाई

सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना॥ हमहू उमा रहे तेहिं संगा। देखत राम चरित रन रंगा॥ १ ॥

अर्थ:

ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानों पर चढ़े हुए आकाश से युद्ध देख रहे हैं। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! मैं भी वहीं उनके संग था और श्रीरामजी के रण-रंग की लीला देख रहा था।

चौपाई

सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥ एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं॥ २ ॥

अर्थ:

दोनों ओर के योद्धा रण-रस में मतवाले हो रहे हैं। वानरों को श्रीरामजी का बल है, इससे वे जयशील हैं (जीत रहे हैं)। एक दूसरे से भिड़ते और ललकारते हैं और एक दूसरे को मसल-मसलकर पृथ्वी पर डाल देते हैं।

चौपाई

मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं॥ उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं॥ ३ ॥

अर्थ:

वे मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरों से दूसरों को मारते हैं। पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं और योद्धाओं को पैर पकड़कर पृथ्वी पर पटक देते हैं।

चौपाई

निसिचर भट महि गाड़हिं भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू॥ बीर बलीमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे॥ ४ ॥

अर्थ:

राक्षस योद्धाओं को भालू पृथ्वी में गाड़ देते हैं और ऊपर से बहुत-सी बालू डाल देते हैं। युद्ध में शत्रुओं से विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रुद्ध काल हों।

छन्द

क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥ मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥ १ ॥

अर्थ:

क्रुद्ध काल के समान वे वानर खून बहते हुए शरीरों से शोभित हो रहे हैं। वे बलवान् योद्धा राक्षसों की सेना के योद्धाओं को मसलते और मेघ की तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटों से मारते, दाँतों से काटकर लातों से पीस डालते हैं। वानर-भालू चिल्लाते हैं और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट नष्ट हो जायँ।

छन्द

धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥ धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥ २ ॥

अर्थ:

वे राक्षसों के गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और गले की अँतड़ियाँ निकालकर डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे देख पड़ते हैं मानो प्रह्लादपति श्रीनृसिंहभगवान् अनेक रूप धारण करके युद्ध के मैदान में क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो--ये घोर शब्द आकाश और पृथ्वी में भर गये हैं। श्रीरामचन्द्रजी की जय हो, जो सचमुच तृण से वज्र और वज्र से तृण कर देते हैं (निर्बल को सबल और सबल को निर्बल कर देते हैं)।

दोहा

निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप। रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप॥ ८१ ॥

अर्थ:

अपनी सेना को व्याकुल देखकर कमर में तरकस कसकर और हाथ में धनुष लेकर श्रीरघुनाथजी के चरणों पर मस्तक नवाकर लक्ष्मणजी क्रोधित होकर चले।

दोहा 82 के अंतर्गत
चौपाई

धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर॥ गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा॥ १ ॥

अर्थ:

रावण अत्यन्त क्रोधित होकर दौड़ा। वानर हुंकार करते हुए [लड़ने के लिए] उसके सामने चले। उन्होंने हाथों में वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर रावण पर एक ही साथ डाले।

चौपाई

लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू॥ चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी॥ २ ॥

अर्थ:

पर्वत उसके वज्रतुल्य शरीर में लगते ही तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं। अत्यन्त क्रोधी रणोन्मत्त रावण रथ रोककर अचल खड़ा रहा, [अपने स्थान से] जरा भी नहीं हिला।

चौपाई

इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा॥ चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना॥ ३ ॥

अर्थ:

उसे बहुत ही क्रोध हुआ। वह इधर-उधर झपटकर और डपटकर वानर योद्धाओं को मसलने लगा। अनेकों वानर-भालू 'हे अंगद! हे हनुमानजी! रक्षा करो, रक्षा करो' [पुकारते हुए] भाग चले।

चौपाई

पाहि पाहि रघुबीर गोसाईं। यह खल खाइ काल की नाईं॥ तेहिं देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने॥ ४ ॥

अर्थ:

हे रघुवीर! हे गोसाईं! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। यह दुष्ट काल की भाँति हमें खा रहा है। उसने देखा कि सब वानर भाग छूटे। तब [रावण ने] दसों धनुषों पर बाण सन्धान किये।

छन्द

संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं। रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहँ कपि भागहीं॥ भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे। रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे॥

अर्थ:

उसने धनुष पर सन्धान करके बाणों के समूह छोड़े। वे बाण सर्प की तरह उड़कर जा लगते थे। पृथ्वी-आकाश और दिशा-विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं। वानर भागें तो कहाँ ? अत्यन्त कोलाहल मच गया। वानर-भालुओं की सेना व्याकुल होकर आर्त पुकार करने लगी--हे रघुवीर! हे करुणा-सिंधु! हे आर्तबंधु! हे जन-रक्षक हरि!

दोहा

निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ॥ ८२ ॥

अर्थ:

अपनी सेना को व्याकुल देखकर कमर में तरकस कसकर और हाथ में धनुष लेकर श्रीरामजी के चरणों पर मस्तक नवाकर लक्ष्मणजी क्रोधित होकर चले।