रावण का युद्ध के लिये प्रस्थान, श्रीरामजी का विजय रथ और वानर-राक्षसों का युद्ध
रावण स्वयं युद्ध के लिए प्रस्थान करता है और उधर श्रीरामजी के विजय रथ का महात्म्य प्रकट होता है। वानर और राक्षसों के बीच संग्राम और अधिक उग्र हो उठता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण २१ / ३७
प्रकरण पाठ
धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते। मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते॥ नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं। जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं॥
अर्थ:
वे विशाल और काल के समान कराल वानर-भालू दौड़े। मानो पंखवाले पर्वतों के समूह उड़ रहे हों। वे अनेक वर्णों के हैं। नख, दाँत, पर्वत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बड़े बलवान् हैं और किसी का भी डर नहीं मानते। रावणरूपी मतवाले हाथी के लिये सिंहरूप श्रीरामजी का जय-जयकार करके वे उनके सुन्दर यश का बखान करते हैं॥
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥ अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥ १ ॥
अर्थ:
रावण को रथ पर और श्रीरघुवीर को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गये। प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया [कि वे बिना रथ के रावण को कैसे जीत सकेंगे]। श्रीरामजी के चरणों की वन्दना करके वे स्नेहपूर्वक कहने लगे।
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ २ ॥
अर्थ:
हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा? कृपानिधान श्रीरामजी ने कहा--हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥ बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥ ३ ॥
अर्थ:
शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिये हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इन्द्रियों का वश में होना) और परोपकार--ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं।
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥ कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥ ५ ॥
अर्थ:
निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), [अहिंसादि] यम और [शौचादि] नियम--ये बहुत-से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है।
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना॥ हमहू उमा रहे तेहिं संगा। देखत राम चरित रन रंगा॥ १ ॥
अर्थ:
ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानों पर चढ़े हुए आकाश से युद्ध देख रहे हैं। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! मैं भी वहीं उनके संग था और श्रीरामजी के रण-रंग की लीला देख रहा था।
सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥ एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं॥ २ ॥
अर्थ:
दोनों ओर के योद्धा रण-रस में मतवाले हो रहे हैं। वानरों को श्रीरामजी का बल है, इससे वे जयशील हैं (जीत रहे हैं)। एक दूसरे से भिड़ते और ललकारते हैं और एक दूसरे को मसल-मसलकर पृथ्वी पर डाल देते हैं।
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं॥ उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं॥ ३ ॥
अर्थ:
वे मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरों से दूसरों को मारते हैं। पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं और योद्धाओं को पैर पकड़कर पृथ्वी पर पटक देते हैं।
निसिचर भट महि गाड़हिं भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू॥ बीर बलीमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे॥ ४ ॥
अर्थ:
राक्षस योद्धाओं को भालू पृथ्वी में गाड़ देते हैं और ऊपर से बहुत-सी बालू डाल देते हैं। युद्ध में शत्रुओं से विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रुद्ध काल हों।
क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥ मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥ १ ॥
अर्थ:
क्रुद्ध काल के समान वे वानर खून बहते हुए शरीरों से शोभित हो रहे हैं। वे बलवान् योद्धा राक्षसों की सेना के योद्धाओं को मसलते और मेघ की तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटों से मारते, दाँतों से काटकर लातों से पीस डालते हैं। वानर-भालू चिल्लाते हैं और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट नष्ट हो जायँ।
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥ धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥ २ ॥
अर्थ:
वे राक्षसों के गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और गले की अँतड़ियाँ निकालकर डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे देख पड़ते हैं मानो प्रह्लादपति श्रीनृसिंहभगवान् अनेक रूप धारण करके युद्ध के मैदान में क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो--ये घोर शब्द आकाश और पृथ्वी में भर गये हैं। श्रीरामचन्द्रजी की जय हो, जो सचमुच तृण से वज्र और वज्र से तृण कर देते हैं (निर्बल को सबल और सबल को निर्बल कर देते हैं)।
संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं। रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहँ कपि भागहीं॥ भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे। रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे॥
अर्थ:
उसने धनुष पर सन्धान करके बाणों के समूह छोड़े। वे बाण सर्प की तरह उड़कर जा लगते थे। पृथ्वी-आकाश और दिशा-विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं। वानर भागें तो कहाँ ? अत्यन्त कोलाहल मच गया। वानर-भालुओं की सेना व्याकुल होकर आर्त पुकार करने लगी--हे रघुवीर! हे करुणा-सिंधु! हे आर्तबंधु! हे जन-रक्षक हरि!