श्रीरामजी का सेनासहित समुद्र पार उतरना, सुबेल पर्वत पर निवास, रावण की व्याकुलता

सेनासहित समुद्र पार कर श्रीरामजी सुबेल पर्वत पर निवास करते हैं। उधर लंका में अशुभ संकेतों से रावण व्याकुल हो उठता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ३ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई॥ सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा॥ १ ॥

अर्थ:

कृपालु रघुनाथजी [तथा लक्ष्मणजी] दोनों भाई ऐसा कौतुक देखकर हँसते हुए चले। श्रीरघुवीर सेना सहित समुद्र के पार उतर गये। वानरों और उनके सेनापतियों की भीड़ कही नहीं जा सकती।

चौपाई

सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा॥ खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु ने समुद्र के पार डेरा डाला और सब वानरों को आज्ञा दी कि तुम जाकर सुन्दर फल-मूल खाओ। यह सुनते ही रीछ-वानर जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े।

चौपाई

सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी॥ खाहिं मधुर फल बिटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के हित (सेवा) के लिये सब तरु फरे, ऋतु अरु कुरितु काल गति त्यागी। खाहिं मधुर फल बिटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं।

चौपाई

जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं॥ दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना॥ ४ ॥

अर्थ:

घूमते-फिरते जहाँ कहीं किसी राक्षस को पा जाते हैं तो सब उसे घेरकर खूब नाच नचाते हैं और दाँतों से उसके नाक-कान काटकर, प्रभु का सुयश कहकर [अथवा कहलाकर] तब उसे जाने देते हैं।

चौपाई

जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता॥ सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना॥ ५ ॥

अर्थ:

जिन राक्षसों के नाक और कान काट डाले गये, उन्होंने रावण से सब समाचार कहा। समुद्र [पर सेतु] का बाँधा जाना कानों से सुनते ही रावण घबड़ाकर दसों मुखों से बोल उठा--

दोहा

बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस। सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस॥ ५ ॥

अर्थ:

वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, बारीस, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीश को क्या सचमुच ही बाँध लिया ?