सुन्दरकाण्ड
सुन्दरकाण्ड में हनुमान की समुद्र लांघने की वीरता, सीता से मिलन और लंका दहन का वर्णन है।
मुख्य प्रसंग: हनुमान का समुद्र लांघना · सीता मिलन · लंका दहन
काण्ड ५ · २० प्रकरण
छंद संख्या
सुन्दरकाण्ड के प्रकरण
मंगलाचरण
सुन्दरकाण्ड का यह मंगलाचरण हनुमानजी की भक्ति, बल और श्रीरामकार्य के प्रति उनके अखंड समर्पण का स्मरण कराता है। इसके साथ काण्ड का आरंभ श्रद्धा, विश्वास और उत्साह से होता है।
हनुमानजी का लंका को प्रस्थान, सुरसा से भेंट, छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध
हनुमानजी समुद्र लाँघकर लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में वे सुरसा की परीक्षा सफलतापूर्वक पार करते हैं और छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध करके आगे बढ़ते हैं।
लंका वर्णन, लंकिनी पर प्रहार, लंका में प्रवेश
हनुमानजी रात्रि में स्वर्णमयी लंका का अवलोकन करते हैं। लंकिनी को परास्त करके वे सूक्ष्म रूप धारण कर नगर में प्रवेश करते हैं।
हनुमान-विभीषण संवाद
लंका में हनुमानजी की भेंट विभीषण से होती है, जो भीतर से श्रीरामभक्त हैं। दोनों के संवाद में भक्ति, नीति और आने वाले कार्य की दिशा स्पष्ट होती है।
हनुमानजी का अशोकवाटिका में सीता को देखकर दुःखी होना और रावण का सीताजी को भय दिखलाना
अशोकवाटिका में हनुमानजी सीताजी को विरह और कष्ट में देखकर अत्यंत द्रवित होते हैं। उसी समय रावण वहाँ आकर भय और प्रलोभन से उन्हें विचलित करने का व्यर्थ प्रयास करता है।
श्रीसीता-त्रिजटा संवाद
राक्षसियों के बीच त्रिजटा सीताजी को सांत्वना देती है और शुभ संकेतों का वर्णन करती है। उसके वचनों से निराशा के बीच आशा की किरण प्रकट होती है।
श्रीसीता-हनुमान संवाद
हनुमानजी विनम्रतापूर्वक श्रीरामजी की मुद्रिका और संदेश सीताजी को देते हैं। सीताजी उन्हें अपना संदेश सौंपती हैं और प्रभु के शीघ्र आगमन की आशा व्यक्त करती हैं।
हनुमानजी द्वारा अशोकवाटिका विध्वंस, अक्षयकुमार वध और मेघनाद का हनुमानजी को नागपाश में बाँधकर सभा में ले जाना
सीताजी को आश्वस्त करने के बाद हनुमानजी अशोकवाटिका उजाड़ देते हैं और अनेक राक्षसों को परास्त करते हैं, जिनमें अक्षयकुमार भी सम्मिलित है। अंततः मेघनाद उन्हें नागपाश में बाँधकर रावण की सभा में ले जाता है।
हनुमान-रावण संवाद
रावण की सभा में हनुमानजी निर्भीक होकर श्रीरामजी का संदेश सुनाते हैं। वे नीति, धर्म और कल्याण का मार्ग बताते हुए सीताजी को लौटा देने की सलाह देते हैं।
लंका दहन
हनुमानजी की पूँछ में लगाई गई अग्नि ही लंका के विनाश का कारण बनती है। वे नगर भर में घूमकर राक्षसों के अहंकार को दग्ध कर देते हैं।
लंका जलाने के बाद हनुमानजी का सीताजी से विदा माँगना और चूड़ामणि पाना
लंका दहन के बाद हनुमानजी पुनः सीताजी के पास जाकर उनसे विदा लेते हैं। सीताजी उन्हें चूड़ामणि देकर श्रीरामजी के लिए अपना स्नेहपूर्ण संदेश सौंपती हैं।
समुद्र के इस पार आना, सब का लौटना, मधुवन प्रवेश, सुग्रीव मिलन, श्रीराम-हनुमान संवाद
हनुमानजी समुद्र पार लौटकर वानर दल से मिलते हैं, और सब मिलकर आनंदपूर्वक मधुवन में प्रवेश करते हैं। सुग्रीव और फिर श्रीरामजी के समक्ष हनुमानजी सीताजी का समाचार, चूड़ामणि और उनका संदेश प्रस्तुत करते हैं।
श्रीरामजी का वानरों की सेना के साथ चलकर समुद्र तट पर पहुँचना
सीताजी का समाचार पाकर श्रीरामजी वानर सेना के साथ लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। चलते-चलते वे समुद्र तट पर पहुँचकर आगे की तैयारी करते हैं।
मंदोदरी-रावण संवाद
मंदोदरी रावण को समझाती है कि सीताजी को लौटाकर अनर्थ टाल दे। वह श्रीरामजी के सामर्थ्य का स्मरण कराकर उसे विवेक से काम लेने की सलाह देती है।
रावण को विभीषण की समझाइश और विभीषण का अपमान
विभीषण बार-बार रावण को धर्म और नीति का मार्ग अपनाने तथा सीताजी को लौटाने की सलाह देते हैं। रावण उनके हितकारी वचनों का अपमान करता है, जिससे विभीषण लंका छोड़ने का निश्चय करते हैं।
विभीषण का भगवान श्रीरामजी की शरण के लिए प्रस्थान और शरणप्राप्ति
विभीषण लंका त्यागकर भगवान श्रीरामजी की शरण में आते हैं। प्रभु उन्हें सहज करुणा से स्वीकार करते हैं और शरणागत वत्सलता का महान आदर्श प्रकट करते हैं।
समुद्र पार करने के लिए विचार, रावणदूत शुक का आना और लक्ष्मणजी के पत्र को लेकर लौटना
समुद्र पार करने के उपाय पर विचार होता है। इसी बीच रावण का दूत शुक आता है और अंततः लक्ष्मणजी का पत्र लेकर रावण के पास लौटता है।
दूत द्वारा रावण को समझाना और लक्ष्मणजी का पत्र देना
शुक रावण को श्रीरामजी की सेना का बल और प्रभु की महिमा बताकर सावधान करता है। फिर वह लक्ष्मणजी का पत्र प्रस्तुत करता है, जिसमें अंतिम चेतावनी निहित है।
समुद्र पर श्रीरामजी का क्रोध और समुद्र की विनती
जब समुद्र मार्ग नहीं देता, तब श्रीरामजी धर्मसम्मत क्रोध प्रकट करते हैं। भयभीत समुद्र विनयपूर्वक उपस्थित होकर मार्ग सुझाता है और प्रभु से क्षमा माँगता है।
श्रीराम गुणगान की महिमा
सुन्दरकाण्ड के अंत में श्रीराम के गुणगान, स्मरण और भक्ति की महिमा कही गई है। यह पाठ श्रद्धालु के हृदय में साहस, विश्वास और मंगल भर देता है।