रावण की मूर्च्छा, रावण के यज्ञ का विध्वंस, राम-रावण युद्ध

रावण मूर्च्छित होता है और उसकी विजयकामी साधना भी विफल कर दी जाती है। इसके बाद राम और रावण का महायुद्ध पुनः प्रखर रूप में सामने आता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २३ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा॥ मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा॥ १ ॥

अर्थ:

हनुमानजी घुटने टेककर रह गये, पृथ्वी पर गिरे नहीं। फिर क्रोध से भरे हुए सँभालकर उठे। हनुमानजी ने रावण को एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्र की मार से पर्वत गिरा हो।

चौपाई

मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा॥ धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही॥ २ ॥

अर्थ:

मूर्च्छा भंग होने पर फिर वह जगा और हनुमानजी के बड़े भारी बल की सराहना करने लगा। [हनुमानजी ने कहा--] मेरे पौरुष को धिक्कार है, धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है, जो हे देवद्रोही! तू अब भी जीता रह गया।

चौपाई

अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो॥ कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता॥ ३ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर और लक्ष्मणजी को उठाकर हनुमानजी श्रीरघुनाथजी के पास ले आये। यह देखकर रावण को आश्चर्य हुआ। श्रीरघुवीर ने [लक्ष्मणजी से] कहा--हे भाई! हृदय में समझो, तुम काल के भी भक्षक और देवताओं के रक्षक हो।

चौपाई

सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला॥ पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए॥ ४ ॥

अर्थ:

ये वचन सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे। वह कराल शक्ति आकाश को चली गयी। लक्ष्मणजी फिर धनुष-बाण लेकर दौड़े और बड़ी शीघ्रता से शत्रु के सामने आ पहुँचे।

छन्द

आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो। गिर्‌यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो॥ सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो। रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो॥

अर्थ:

फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रता से रावण के रथ को चूर-चूर कर और सारथी को मारकर उसे व्याकुल कर दिया। सौ बाणों से उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। तब दूसरा सारथी उसे रथ में डालकर तुरंत ही लंका ले गया। प्रताप के समूह श्रीरघुवीर के भाई लक्ष्मणजी ने फिर आकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया।

दोहा

उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य। राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य॥ ८४ ॥

अर्थ:

वहाँ (लंका में) रावण मूर्च्छा से जागकर कुछ यज्ञ करने लगा। वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठवश श्रीरघुनाथजी से विरोध करके विजय चाहता है।

दोहा 85 के अंतर्गत
चौपाई

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई॥ नाथ करइ रावन एक जागा। सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा॥ १ ॥

अर्थ:

यहाँ विभीषणजी ने सब खबर पायी और तुरंत जाकर श्रीरघुनाथजी को कह सुनायी कि हे नाथ! रावण एक यज्ञ कर रहा है। उसके सिद्ध होने पर वह अभागा सहज ही नहीं मरेगा।

चौपाई

पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं बिधंस आव दसकंधर॥ प्रात होत प्रभु सुभट पठाए। हनुमदादि अंगद सब धाए॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! तुरंत वानर योद्धाओं को भेजिये; जो यज्ञ का विध्वंस करें, जिससे रावण युद्ध में आवे। प्रातःकाल होते ही प्रभु ने वीर योद्धाओं को भेजा। हनुमान् और अंगद आदि सब [प्रधान वीर] दौड़े।

चौपाई

कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका॥ जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा॥ ३ ॥

अर्थ:

वानर खेल से ही कूदकर लंका पर जा चढ़े और निर्भय रावण के महल में जा घुसे। ज्यों ही उसको यज्ञ करते देखा, त्यों ही सब वानरों को बहुत क्रोध हुआ।

चौपाई

रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा॥ अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता॥ ४ ॥

अर्थ:

[उन्होंने कहा--] अरे ओ निर्लज्ज! रणभूमि से घर भाग आया और यहाँ आकर बगुले का-सा ध्यान लगाकर बैठा है? ऐसा कहकर अंगद ने लात मारी। पर उसने इनकी ओर देखा भी नहीं, उस दुष्ट का मन स्वार्थ में अनुरक्त था।

छन्द

नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं। धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं॥ तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई। एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई॥

अर्थ:

जब उसने नहीं देखा, तब वानर क्रोध करके उसे दाँतों से पकड़कर [काटने और] लातों से मारने लगे। स्त्रियों को बाल पकड़कर घर से बाहर घसीट लाये, वे अत्यन्त ही दीन होकर पुकारने लगीं। तब रावण काल के समान क्रोधित होकर उठा और वानरों को पैर पकड़कर पटकने लगा। इसी बीच वानरों ने यज्ञ विध्वंस कर डाला, यह देखकर वह मन में हारने लगा (निराश होने लगा)।

दोहा

जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास। चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागि जिवन कै आस॥ ८५ ॥

अर्थ:

यज्ञ विध्वंस करके सब चतुर वानर रघुनाथजी के पास आ गये। तब रावण जीने की आशा छोड़कर क्रोधित होकर चला।

दोहा 86 के अंतर्गत
चौपाई

चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर॥ भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना॥ १ ॥

अर्थ:

चलते समय अत्यन्त अशुभ और भयंकर अपशकुन होने लगे। गीध उड़-उड़कर उसके सिरों पर बैठने लगे। किन्तु वह काल के वश था, इससे किसी भी अपशकुन को नहीं मानता था। उसने कहा-- युद्ध का डंका बजाओ।

चौपाई

चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा॥ प्रभु सन्मुख धाए खल कैसें। सलभ समूह अनल कहँ जैसें॥ २ ॥

अर्थ:

निशाचरों की अपार सेना चली। उसमें बहुत-से हाथी, रथ, पैदल और घुड़सवार थे। वे दुष्ट प्रभु के सामने कैसे दौड़े, जैसे पतंगों के समूह अग्नि की ओर [जलने के लिये] दौड़ते हैं।

चौपाई

इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही॥ अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही॥ ३ ॥

अर्थ:

इधर देवताओं ने स्तुति की कि हे श्रीरामजी! इसने हमको दारुण दुःख दिये हैं। अब आप इसे [अधिक] न खेलाइये। जानकीजी बहुत ही दुखी हो रही हैं।

चौपाई

देव बचन सुनि प्रभु मुसुकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना॥ जटा जूट दृढ़ बाँधें माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे॥ ४ ॥

अर्थ:

देवताओं के वचन सुनकर प्रभु मुसकराये। फिर श्रीरघुवीर ने उठकर बाण सुधारे। मस्तक पर जटाओं के जूड़े को कसकर बाँधे हुए हैं, उसके बीच-बीच में पुष्प गूँथे हुए शोभित हो रहे हैं।

चौपाई

अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा॥ कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा॥ ५ ॥

अर्थ:

लाल नेत्र और मेघ के समान श्याम शरीर वाले तथा सम्पूर्ण लोकों के नेत्रों को आनन्द देनेवाले हैं। प्रभु ने कमर में फेंट तथा तरकस कस लिया और हाथ में कठोर सारंग धनुष ले लिया।

छन्द

सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो। भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो॥ कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे। ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे॥

अर्थ:

प्रभु ने हाथ में सारंग धनुष लेकर कमर में बाणों की खान-सा सुन्दर तरकस कस लिया। उनके भुजदण्ड पुष्ट हैं, मनोहर और लम्बी भुजाएँ हैं, तथा छाती पर धरासुर-पद शोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं, ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हाथ में लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओं के हाथी, कच्छप, सर्प, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे।

दोहा

सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार। जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार॥ ८६ ॥

अर्थ:

शोभा देखकर देवता हर्षित होकर फूलों की अपार वर्षा करने लगे। और शोभा, शक्ति और गुणों के धाम करुणानिधान प्रभु की जय हो, जय हो, जय हो [ऐसा पुकारने लगे]।

दोहा 87 के अंतर्गत
चौपाई

एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी॥ देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा॥ १ ॥

अर्थ:

इसी बीच में निशाचरों की अत्यन्त घनी सेना कसमसाती हुई (आपस में टकराती हुई) आयी। उसे देखकर वानर योद्धा इस प्रकार सामने चले जैसे प्रलयकाल के बादलों के समूह हों।

चौपाई

बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं॥ गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा॥ २ ॥

अर्थ:

बहुत-से कृपाण और तलवारें चमक रही हैं। मानो दसों दिशाओं में बिजलियाँ चमक रही हों। हाथी, रथ और घोड़ों का कठोर चिग्घाड़ ऐसा लगता है मानो बादल भयंकर गर्जन कर रहे हों।

चौपाई

कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए॥ उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा॥ ३ ॥

अर्थ:

वानरों की बहुत-सी पूँछें आकाश में छायी हुई हैं। वे ऐसी शोभा दे रही हैं मानो सुन्दर इन्द्रधनुष उदय हुए हों। धूल ऐसी उठ रही है मानो जल की धारा हो। बाणरूपी बूँदों की अपार वृष्टि हुई।

चौपाई

दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा॥ रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई॥ ४ ॥

अर्थ:

दोनों ओर से योद्धा पर्वतों का प्रहार करते हैं। मानो बार-बार वज्रपात हो रहा हो। श्रीरघुनाथजी ने क्रोध करके बाणों की झड़ी लगा दी, जिससे राक्षसों की सेना घायल हो गयी।

चौपाई

लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं॥ स्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी॥ ५ ॥

अर्थ:

बाण लगते ही वीर चीत्कार कर उठते हैं और चक्कर खा-खाकर जहाँ-तहाँ पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। उनके शरीरों से ऐसे खून बह रहा है मानो पर्वत के भारी झरनों से जल बह रहा हो। इस प्रकार डरपोकों को भय उत्पन्न करने वाली रुधिर की नदी बह चली।

छन्द

कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी। दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी॥ जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने। सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने॥

अर्थ:

डरपोकों को भय उपजानेवाली अत्यन्त अपवित्र रक्त की नदी बह चली। दोनों कूल उसके दोनों किनारे हैं। रथ रेत है और पहिये भँवर हैं। वह नदी बहुत भयावनी बह रही है। हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे तथा अनेकों सवारियाँ ही, जिनकी गिनती कौन करे, नदी के जलजन्तु हैं। बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं; धनुष तरंगें हैं और ढाल बहुत-से कछुए हैं॥

दोहा

बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन। कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन॥ ८७ ॥

अर्थ:

वीर पृथ्वी पर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी-किनारे के वृक्ष ढह रहे हों। बहुत-सी मज्जा बह रही है, वही फेन है। डरपोक जहाँ इसे देखकर डरते हैं, वहाँ उत्तम योद्धाओं के मन में सुख होता है।

दोहा 88 के अंतर्गत
चौपाई

मज्जहिं भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला॥ काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

भूत, पिशाच और बैताल, बड़े-बड़े झोटिंग कराल प्रमथ (शिवगण) उस नदी में स्नान करते हैं। कौए और चील भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक दूसरे से छीनकर खा जाते हैं।

चौपाई

एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई॥ कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे॥ २ ॥

अर्थ:

एक (कोई) कहते हैं, अरे मूर्खो! ऐसी सौंघाई (बहुतायत) है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती? घायल योद्धा तट पर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अर्धजल (आधे जल में पड़े) पड़े हों।

चौपाई

खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए॥ बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

गीध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछलीमार नदी-तट पर चित्त लगाए हुए बंसी खेल रहे हों। बहुत-से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उन पर चढ़े चले जा रहे हैं। मानो वे नदी में नावरि (नौकाक्रौड़ा) खेल रहे हों।

चौपाई

जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं॥ भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं॥ ४ ॥

अर्थ:

योगिनियाँ खप्परों में भर-भरकर खून जमा कर रही हैं। भूत-पिशाचों की स्त्रियाँ आकाश में नाच रही हैं। चामुण्डाएँ योद्धाओं की खोपड़ियों का करताल बजा रही हैं और नाना प्रकार से गा रही हैं।

चौपाई

जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं॥ कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं॥ ५ ॥

अर्थ:

गीदड़ों के समूह कट-कट शब्द करते हुए मुरदों को काटते, खाते, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जाने पर एक दूसरे को डाँटते हैं। करोड़ों धड़ बिना सिर के घूम रहे हैं और सिर पृथ्वी पर पड़े जय-जय बोल रहे हैं।

छन्द

बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं। खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं॥ बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए। संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए॥

अर्थ:

मुण्ड (कटे सिर) जय-जय बोलते हैं और प्रचण्ड रुण्ड (धड़) बिना सिर के दौड़ते हैं। खप्परों और तलवारों में उलझ-उलझकर योद्धा आपस में लड़ते हैं; उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओं को ढहा रहे हैं। वानर राक्षसों के झुण्डों को मसल रहे हैं, श्रीराम के बल से दर्पित होकर। संग्राम-आँगन में योद्धा सो रहे हैं, श्रीराम के बाण-समूहों से हए हुए॥

दोहा

रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार। मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार॥ ८८ ॥

अर्थ:

रावण ने हृदय में विचारा कि राक्षसों का नाश हो गया है। मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिए मैं अब अपार माया रचूँ।