मंगलाचरण

लंका कांड के आरंभ में तुलसीदास जी गुरु, देवताओं और भगवन्नाम की वंदना करते हैं। यह प्रार्थनामय भूमिका पूरे कांड को मंगलमय और भक्तिभाव से ओतप्रोत करती है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण १ / ३७

प्रकरण पाठ

श्लोक

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्‌॥ १ ॥

अर्थ:

कामदेव के शत्रु शिवजी के सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथी के लिये सिंह के समान, योगियों के स्वामी (योगीश्वर), ज्ञान के द्वारा जानने योग्य, गुणों की निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, माया से परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टों के वध में तत्पर, ब्राह्मणवृन्द के एकमात्र देवता (रक्षक), जलवाले मेघ के समान सुन्दर श्याम, कमल के-से नेत्रवाले, पृथ्वीपति (राजा) के रूप में परमदेव श्रीरामजी की मैं वन्दना करता हूँ।

श्लोक

शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्‌। काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शंकरम्‌॥ २ ॥

अर्थ:

शंख और चन्द्रमा-सी कान्ति वाले अत्यन्त सुन्दर शरीर वाले, व्याघ्रचर्म के वस्त्र वाले, काल के समान [अथवा काले रंग के] भयानक सर्पों के भूषण धारण करने वाले, गंगा और चन्द्रमा के प्रिय, काशीपति, कलियुग के पाप-समूह का नाश करने वाले, कल्याण के कल्पद्रुम, गुणों के निधान और कामदेव को भस्म करने वाले पार्वतीपति वन्दनीय श्रीशंकरजी को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक

यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्‌। खलानां दण्डकृद्योऽसौ शंकरः शं तनोतु मे॥ ३ ॥

अर्थ:

जो सत्पुरुषों को अत्यन्त दुर्लभ कैवल्य-मुक्ति तक दे डालते हैं और जो दुष्टों को दण्ड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी श्रीशम्भु मेरे कल्याण का विस्तार करें।