पुष्पक विमान पर चढ़कर श्रीसीता-रामजी का अवध के लिये प्रस्थान

श्रीसीता-रामजी पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अवध की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके साथ सभी प्रेममय सहचर विजय के बाद घर लौटने की आनंदमयी यात्रा आरम्भ करते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ३६ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥ मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी ने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमान पर चढ़ा लिया। तदनन्तर मन-ही-मन विप्र चरणों में सिर नवाकर उत्तर दिशा की ओर विमान चलाया।

चौपाई

चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई॥ सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर॥ २ ॥

अर्थ:

विमान के चलते समय बड़ा शोर हो रहा है। सब कोई श्रीरघुवीर की जय कह रहे हैं। विमान में एक अत्यन्त ऊँचा मनोहर सिंहासन है। उस पर सीताजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हो गये।

चौपाई

राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥ रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥ ३ ॥

अर्थ:

पत्नी सहित श्रीरामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेर के शिखर पर बिजली सहित श्याम मेघ हो। सुन्दर विमान बड़ी शीघ्रता से चला। देवता हर्षित हुए और उन्होंने फूलों की वर्षा की।

चौपाई

परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥ सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥ ४ ॥

अर्थ:

अत्यन्त सुख देनेवाली तीन प्रकार की (शीतल, मन्द, सुगन्धित) वायु चलने लगी। समुद्र, सरोवर और नदियों का जल निर्मल हो गया। चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगे। सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं।

चौपाई

कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता॥ हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे॥ ५ ॥

अर्थ:

श्रीरघुवीर ने कहा—हे सीते! रणभूमि देखो। लक्ष्मण ने यहाँ इन्द्रजीत को मारा था। हनुमान् और अंगद के मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर रणभूमि में पड़े हैं।

चौपाई

कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई॥ ६ ॥

अर्थ:

देवताओं और मुनियों को दुःख देनेवाले कुम्भकर्ण और रावण दोनों भाई यहाँ मारे गये।

दोहा

इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम। सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम॥ ११९ (क) ॥

अर्थ:

मैंने यहाँ पुल बाँधा (बँधवाया) और सुखधाम श्रीशिवजी की स्थापना की। तदनन्तर कृपानिधान श्रीरामजी ने सीताजी सहित श्रीशंभु को प्रणाम किया।

दोहा

जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम। सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥ ११९ (ख) ॥

अर्थ:

वन में जहाँ-जहाँ करुणासागर श्रीरामचन्द्रजी ने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभु ने जानकीजी को दिखलाये और सब के नाम बतलाये।

दोहा 120 के अंतर्गत
चौपाई

तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा॥ कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना॥ १ ॥

अर्थ:

विमान शीघ्र ही वहाँ चला आया जहाँ परम सुन्दर दण्डकवन था, और कुम्भजादि अनेक मुनिनायक रहते थे। श्रीरामजी इन सब के स्थानों में गये।

चौपाई

सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥ तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥ २ ॥

अर्थ:

सम्पूर्ण ऋषियों से आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्रीरामजी चित्रकूट आये। वहाँ मुनियों को सन्तुष्ट किया। [फिर] विमान वहाँ से आगे तेजी के साथ चला।

चौपाई

बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई॥ पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरामजी ने जानकीजी को कलियुग के पापों का हरण करनेवाली सुहावनी यमुनाजी के दर्शन कराये। फिर पवित्र गंगाजी के दर्शन किये। श्रीरामजी ने कहा—हे सीते! इन्हें प्रणाम करो।

चौपाई

तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥ देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥ पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥ ४-५ ॥

अर्थ:

फिर तीर्थराज प्रयाग को देखो, जिसके दर्शन से ही करोड़ों जन्मों के पाप भाग जाते हैं। फिर परम पवित्र त्रिवेणी जी के दर्शन करो, जो शोकों को हरनेवाली और हरि लोक पहुँचने की सीढ़ी के समान है। फिर अत्यन्त पवित्र अयोध्यापुरी के दर्शन करो, जो तीनों प्रकार के तापों और भव (आवागमनरूपी) रोग का नाश करनेवाली है।

दोहा

सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम। सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम॥ १२० (क) ॥

अर्थ:

यों कहकर कृपालु श्रीरामजी ने सीताजी सहित अवधपुरी को प्रणाम किया। सजल नेत्र और पुलकित शरीर होकर श्रीरामजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं।

दोहा

पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह। कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह॥ १२० (ख) ॥

अर्थ:

फिर त्रिवेणी में आकर प्रभु ने हर्षित होकर स्नान किया और कपियों सहित ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिये।

दोहा 121 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥ भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥ १ ॥

अर्थ:

तदनन्तर प्रभु ने हनुमानजी को समझाकर कहा—तुम ब्रह्मचारी का रूप धरकर अवधपुरी को जाओ। भरत को हमारी कुशल सुनाना और उनका समाचार लेकर चले आना।

चौपाई

तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ॥ नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही॥ २ ॥

अर्थ:

पवनपुत्र हनुमानजी तुरंत ही चल दिये। तब प्रभु भरद्वाजजी के पास गये। मुनि ने [इष्टबुद्धि से] उनकी अनेकों प्रकार से पूजा की और स्तुति की और फिर [लीला की दृष्टि से] आशीर्वाद दिया।

चौपाई

मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी॥ इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए॥ ३ ॥

अर्थ:

दोनों हाथ जोड़कर तथा मुनि के चरणों की वन्दना करके प्रभु विमान पर चढ़कर फिर (आगे) चले। यहाँ जब निषादराज ने सुना कि प्रभु आ गये, तब उसने “नाव कहाँ है? नाव कहाँ है?” पुकारते हुए लोगों को बुलाया।

चौपाई

सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो॥ तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी॥ ४ ॥

अर्थ:

इतने में ही विमान गंगा को लाँघकर [इस पार] आ गया और प्रभु की आज्ञा पाकर वह किनारे पर उतरा। तब सीताजी ने बहुत प्रकार से गंगा जी की पूजा करके फिर उनके चरणों पर गिरी।

चौपाई

दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा॥ सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल॥ ५ ॥

अर्थ:

गंगाजी ने मन में हर्षित होकर आशीर्वाद दिया—हे सुन्दरी! तुम्हारा सुहाग अखण्ड हो। भगवान् के तट पर उतरने की बात सुनते ही निषादराज गुह प्रेम में विह्वल होकर दौड़ा। परम सुख से परिपूर्ण होकर वह प्रभु के समीप आया।

चौपाई

प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही। परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही॥ प्रीति परम बिलोकि रघुराई। हरषि उठाइ लियो उर लाई॥ ६ ॥

अर्थ:

और श्रीजानकीजी सहित प्रभु को देखकर वह [आनन्द-समाधि में मग्र होकर] पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसे शरीर की सुधि न रही। श्रीरघुनाथजी ने उसका परम प्रेम देखकर उसे उठाकर हर्ष के साथ हृदय से लगा लिया।

छन्द

लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती। बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती॥ अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे। सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते॥ १ ॥

अर्थ:

सुजानों के राजा, लक्ष्मीकान्त, कृपानिधान भगवान् ने उसको हृदय से लगा लिया और अत्यन्त निकट बैठाकर कुशल पूछी। वह विनती करने लगा—आपके जो चरणकमल ब्रह्माजी और शंकरजी से सेवित हैं, उनके दर्शन करके मैं अब सकुशल हूँ। हे सुखधाम! हे पूर्णकाम श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ।

छन्द

सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो। मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो॥ यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा। कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा॥ २ ॥

अर्थ:

सब प्रकार से नीच उस निषाद को भगवान् ने भरतजी की भाँति हृदय से लगा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं—इस मन्दबुद्धि ने (मैंने) मोहवश उस प्रभु को भुला दिया। रावण के शत्रु का यह पवित्र करनेवाला चरित्र सदा ही श्रीरामजी के चरणों में प्रीति उत्पन्न करनेवाला है। यह कामादि विकारों को हरनेवाला और [भगवान् के स्वरूप का] विशेष ज्ञान उत्पन्न करनेवाला है। देवता, सिद्ध और मुनि आनन्दित होकर इसे गाते हैं।