सुबेल पर श्रीरामजी की झाँकी और चंद्रोदय का वर्णन
सुबेल पर विराजमान श्रीरामजी की मनोहर झाँकी का दर्शन कराया गया है। साथ ही चंद्रोदय का सुंदर और भावपूर्ण वर्णन वातावरण को अलौकिक बना देता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ५ / ३७
प्रकरण पाठ
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥ दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना॥ ३ ॥
अर्थ:
प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीव की गोद में अपना सिर रखे हैं। उनकी बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [रखा] है। वे अपने दोनों कर-कमलों से बाण सुधार रहे हैं। विभीषणजी कानों से लगकर सलाह कर रहे हैं।
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा॥ कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई॥ २ ॥
अर्थ:
आकाश में बिखरे हुए तारे मोतियों के समान हैं, जो रात्रि-रूपी सुन्दर स्त्री के श्रृंगार हैं। प्रभु ने कहा- भाइयो ! चन्द्रमा में जो कालापन है वह क्या है ? अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार कहो।
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा॥ छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
कोई कहता है--जब ब्रह्मा ने [कामदेव की स्त्री] रति का मुख बनाया, तब उसने चन्द्रमा का सार भाग निकाल लिया [जिससे रति का मुख तो परम सुन्दर बन गया, परन्तु चन्द्रमा के हृदय में छेद हो गया]। वही छेद चन्द्रमा के हृदय में वर्तमान है, जिसकी राह से आकाश की काली छाया उसमें दिखाई पड़ती है।
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा॥ बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी॥ ५ ॥
अर्थ:
प्रभु श्रीरामजी ने कहा--विष चन्द्रमा का बहुत प्यारा भाई है। इसी से उसने विष को अपने हृदय में स्थान दे रखा है। विषयुक्त अपने किरणसमूह को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है।