सुबेल पर श्रीरामजी की झाँकी और चंद्रोदय का वर्णन

सुबेल पर विराजमान श्रीरामजी की मनोहर झाँकी का दर्शन कराया गया है। साथ ही चंद्रोदय का सुंदर और भावपूर्ण वर्णन वातावरण को अलौकिक बना देता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ५ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा॥ सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥ १ ॥

अर्थ:

यहाँ श्रीरघुवीर सुबेल पर्वत पर सेना की बड़ी भीड़ (बड़े समूह) के साथ उतरे। पर्वत का एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेष रूप से उज्ज्वल शिखर देखकर--।

चौपाई

तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥ ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला। तेहि आसन आसीन कृपाला॥ २ ॥

अर्थ:

वहाँ लक्ष्मणजी ने वृक्षों के कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथों से सजाकर बिछा दिये। उस पर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी। उसी आसन पर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे।

चौपाई

प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥ दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीव की गोद में अपना सिर रखे हैं। उनकी बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [रखा] है। वे अपने दोनों कर-कमलों से बाण सुधार रहे हैं। विभीषणजी कानों से लगकर सलाह कर रहे हैं।

चौपाई

बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना॥ प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन॥ ४ ॥

अर्थ:

परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान् अनेकों प्रकार से प्रभु के चरणकमलों को दबा रहे हैं। लक्ष्मणजी कमर में तरकस कसे और हाथों में धनुष-बाण लिये वीरासन से प्रभु के पीछे सुशोभित हैं।

दोहा

एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन। धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन॥ ११ (क) ॥

अर्थ:

इस प्रकार कृपा, रूप (सौन्दर्य) और गुणों के धाम श्रीरामजी विराजमान हैं। वे मनुष्य धन्य हैं जो सदा इस ध्यान में लौ लगाये रहते हैं।

दोहा

पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक। कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक॥ ११ (ख) ॥

अर्थ:

पूर्व दिशा की ओर देखकर प्रभु श्रीरामजी ने चन्द्रमा को उदय हुआ देखा। तब वे सबसे कहने लगे-चन्द्रमा को तो देखो। कैसा सिंह के समान निडर है!।

दोहा 12 के अंतर्गत
चौपाई

पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी॥ मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी॥ १ ॥

अर्थ:

पूर्व दिशारूपी पर्वत की गुफा में रहनेवाला, अत्यन्त प्रताप, तेज और बल की राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथी के मस्तक को विदीर्ण करके आकाशरूपी वन में निर्भय विचर रहा है।

चौपाई

बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा॥ कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई॥ २ ॥

अर्थ:

आकाश में बिखरे हुए तारे मोतियों के समान हैं, जो रात्रि-रूपी सुन्दर स्त्री के श्रृंगार हैं। प्रभु ने कहा- भाइयो ! चन्द्रमा में जो कालापन है वह क्या है ? अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार कहो।

चौपाई

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई॥ मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई॥ ३ ॥

अर्थ:

सुग्रीव ने कहा- हे रघुनाथजी ! सुनिये। चन्द्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई दे रही है। किसी ने कहा--चन्द्रमा को राहु ने मारा था। वही [चोट का] काला दाग हृदय पर पड़ा हुआ है।

चौपाई

कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा॥ छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

कोई कहता है--जब ब्रह्मा ने [कामदेव की स्त्री] रति का मुख बनाया, तब उसने चन्द्रमा का सार भाग निकाल लिया [जिससे रति का मुख तो परम सुन्दर बन गया, परन्तु चन्द्रमा के हृदय में छेद हो गया]। वही छेद चन्द्रमा के हृदय में वर्तमान है, जिसकी राह से आकाश की काली छाया उसमें दिखाई पड़ती है।

चौपाई

प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा॥ बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी॥ ५ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामजी ने कहा--विष चन्द्रमा का बहुत प्यारा भाई है। इसी से उसने विष को अपने हृदय में स्थान दे रखा है। विषयुक्त अपने किरणसमूह को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है।

दोहा

कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास॥ १२ (क) ॥

अर्थ:

हनुमानजी ने कहा- हे प्रभो ! सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुन्दर श्याम मूर्ति चन्द्रमा के हृदय में बसती है, वही श्यामता की झलक चन्द्रमा में है।