मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस, युद्ध और मेघनाद का उद्धार
मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस कर उसे अपूर्ण कर दिया जाता है। फिर भीषण युद्ध में उसका अंत होता है और प्रभु की कृपा से उसका उद्धार होता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण २० / ३७
प्रकरण पाठ
रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान। धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥ ७६ ॥
अर्थ:
राम के छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं? ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। अंगद और हनुमान कहने लगे—धन्य धन्य तेरी जननी कह [जो तू लक्ष्मणजी के हाथों मरा और मरते समय श्रीराम-लक्ष्मण को स्मरण करके तूने उनके नामों का उच्चारण किया]।
बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं॥ जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा॥ २ ॥
अर्थ:
वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश गाते हैं। हे अनंत! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो। हे प्रभो! आपने सब देवताओं का [महान् विपत्ति से] उद्धार किया।
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन॥ पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥ १ ॥
अर्थ:
रावण ने उनको ज्ञान का उपदेश किया। वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा शुभ और पवित्र है। दूसरों को उपदेश देने में तो बहुत लोग निपुण होते हैं। पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेश के अनुसार आचरण भी करते हैं।
अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥
अर्थ:
अत्यन्त गर्व के कारण वह शकुन-अशकुन का विचार नहीं करता। हथियार हाथों से गिर रहे हैं। योद्धा रथ से गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिग्घाड़ते हुए भाग जाते हैं। सियार, गीध, कराल गधे और कुत्ते बहुत अधिक बोल रहे हैं। उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो काल के दूत हों॥