मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस, युद्ध और मेघनाद का उद्धार

मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस कर उसे अपूर्ण कर दिया जाता है। फिर भीषण युद्ध में उसका अंत होता है और प्रभु की कृपा से उसका उद्धार होता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण २० / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥ कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा॥ १ ॥

अर्थ:

वानरों ने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ खून और भैंसे की आहुति दे रहा है। वानरों ने सब यज्ञ विध्वंस कर दिया। फिर भी जब वह नहीं उठा, तब वे उसकी प्रशंसा करने लगे।

चौपाई

तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई॥ लै त्रिसूल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे॥ २ ॥

अर्थ:

इतने पर भी वह नहीं उठा, [तब] उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़ लिए और लातों से मार-मारकर वे भाग चले। वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तब वानर भागे और वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे।

चौपाई

आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा॥ कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए॥ ३ ॥

अर्थ:

वह अत्यन्त क्रोध से मारा हुआ आया और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा। मारुतसुत और अंगद क्रोध करके दौड़े। उसने छाती में त्रिशूल मारकर दोनों को धरती पर गिरा दिया।

चौपाई

प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा॥ उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर उसने प्रभु पर प्रचण्ड शूल छोड़ा। बाण से वार कर उसके असंख्य टुकड़े कर दिये। हनुमानजी और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोध करके उसे मारने लगे, पर उसे चोट न लगी।

चौपाई

फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा॥ आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला॥ ५ ॥

अर्थ:

शत्रु मारे नहीं मरता, यह देखकर जब वीर लौटे, तब वह घोर चिग्घाड़ करके दौड़ा। उसे क्रुद्ध काल की तरह आता देखकर लक्ष्मणजी ने भयानक बाण छोड़े।

चौपाई

देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना॥ बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई॥ ६ ॥

अर्थ:

वज्र के समान बाणों को आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर विविध वेश धारण कर युद्ध करने लगा। वह कभी प्रगट होता था और कभी दूर चला जाता था।

चौपाई

देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा॥ लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा॥ ७ ॥

अर्थ:

शत्रु को पराजित न होता देखकर वानर डरे। तब सर्पराज बहुत ही क्रोधित हुआ। लक्ष्मणजी ने मन में यह मंत्र दृढ़ किया कि इस पापी को मैं बहुत खेला चुका हूँ।

चौपाई

सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥ छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥ ८ ॥

अर्थ:

कोसलाधीश श्रीरामजी के प्रताप का स्मरण करके लक्ष्मणजी ने दर्पपूर्वक बाण का संधान किया। बाण छोड़ते ही वह उसकी छाती के बीच लग गया। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया।

दोहा

रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान। धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥ ७६ ॥

अर्थ:

राम के छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं? ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। अंगद और हनुमान कहने लगे—धन्य धन्य तेरी जननी कह [जो तू लक्ष्मणजी के हाथों मरा और मरते समय श्रीराम-लक्ष्मण को स्मरण करके तूने उनके नामों का उच्चारण किया]।

दोहा 77 के अंतर्गत
चौपाई

बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो॥ तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा॥ १ ॥

अर्थ:

हनुमानजी ने उसको बिना ही परिश्रम के उठा लिया और लंका के दरवाजे पर रखकर वे लौट आये। उसके मरने का समाचार सुनकर देवता और गन्धर्व आदि सब विमानों पर चढ़कर आकाश में आये।

चौपाई

बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं॥ जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा॥ २ ॥

अर्थ:

वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश गाते हैं। हे अनंत! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो। हे प्रभो! आपने सब देवताओं का [महान् विपत्ति से] उद्धार किया।

चौपाई

अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लछिमन कृपासिंधु पहिं आए॥ सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

देवता और सिद्ध स्तुति करके चले गये, तब लक्ष्मणजी कृपासिंधु के पास आये। पुत्रवध का समाचार सुनते ही रावण मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

चौपाई

मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी॥ नगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहहिं दसकंधर पोचा॥ ४ ॥

अर्थ:

मन्दोदरी छाती पीट-पीटकर और बहुत प्रकार से पुकार-पुकारकर बड़ा भारी विलाप करने लगी। नगर के सब लोग शोक से व्याकुल हो गये। सभी रावण को नीच कहने लगे।

दोहा

तब दसकंठ बिबिधि बिधि समुझाईं सब नारि। नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि॥ ७७ ॥

अर्थ:

तब दसकंठ ने विविध विधि से सब नारियों को समझाया। नश्वर रूप जगत को सब देखो, हृदय में विचार कर॥

दोहा 78 के अंतर्गत
चौपाई

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन॥ पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥ १ ॥

अर्थ:

रावण ने उनको ज्ञान का उपदेश किया। वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा शुभ और पवित्र है। दूसरों को उपदेश देने में तो बहुत लोग निपुण होते हैं। पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेश के अनुसार आचरण भी करते हैं।

चौपाई

निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा॥ सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला॥ २ ॥

अर्थ:

रात बीत गई, भिनसारा हुआ। रीछ-वानर चारों दरवाजों पर जा डटे। योद्धाओं को बुलाकर दशमुख रावण ने कहा—लड़ाई में शत्रु के सम्मुख जाकर जिसका मन डाँवाडोल हो।

चौपाई

सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई॥ निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा॥ ३ ॥

अर्थ:

अच्छा है, वह अभी भाग जाए। युद्ध में विमुख होने में भलाई नहीं है। मैंने अपनी भुजाओं के बल पर वैर बढ़ाया है। जो शत्रु चढ़ आया है, उसका मैं उत्तर दूँगा।

चौपाई

अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा॥ चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर उसने पवन के समान तेज चलने वाला रथ सजाया। सारे जुझाऊ (लड़ाई के) बाजे बजने लगे। सब अतुलनीय बलवान वीर ऐसे चले मानो काजल की आँधी चली हो।

चौपाई

असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला॥ ५ ॥

अर्थ:

उस समय असंख्य अशकुन होने लगे। पर अपनी भुजाओं के बल का बड़ा गर्व होने से वह उन्हें गिनता नहीं है।

छन्द

अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥

अर्थ:

अत्यन्त गर्व के कारण वह शकुन-अशकुन का विचार नहीं करता। हथियार हाथों से गिर रहे हैं। योद्धा रथ से गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिग्घाड़ते हुए भाग जाते हैं। सियार, गीध, कराल गधे और कुत्ते बहुत अधिक बोल रहे हैं। उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो काल के दूत हों॥

दोहा

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम। भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥ ७८ ॥

अर्थ:

जो जीवों के द्रोह में रत है, मोह के वश हो रहा है, राम विमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्न में भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्त की शान्ति हो सकती है?