लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, लक्ष्मणजी को शक्ति लगना
लक्ष्मणजी और मेघनाद के बीच घोर युद्ध होता है। अंत में मेघनाद की शक्ति लगने से लक्ष्मणजी मूर्च्छित होकर गिर पड़ते हैं।
लंकाकाण्ड · प्रकरण १३ / ३७
प्रकरण पाठ
एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥ क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥ २ ॥
अर्थ:
एक-दूसरे को (कोई किसी को) जीत नहीं सकता। राक्षस छल-बल (माया) और अनीति (अधर्म) करता है, तब भगवान् अनन्तजी (लक्ष्मणजी) क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथ को तोड़ डाला और सारथी को टुकड़े-टुकड़े कर दिये!।
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥ सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥ १ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे! सुनो, [प्रलयकालमें ] जिन (शेषनाग)-के क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर [जीव] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है ?।
ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥ तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥ ३ ॥
अर्थ:
व्यापक, ब्रह्म, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ईश्वर और करुणा की खान श्रीरामचन्द्रजी ने पूछा-- लक्ष्मण कहाँ हैं? तब तक हनुमान् उन्हें ले आये। छोटे भाई को [इस दशा में] देखकर प्रभु ने बहुत ही दुःख माना।