जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु
छन्द, दोहा १०३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा। तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥ यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥
अर्थ
षडानन (स्वामिकार्तिक) के जन्म, कर्म, प्रताप और महान पुरुषार्थ को सारा जगत् जानता है। इसलिये मैंने वृषकेतु (शिवजी) के पुत्र का चरित्र संक्षेप से ही कहा है। शिव-पार्वती के विवाह की इस कथा को जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गायेंगे, वे कल्याण के काज, विवाह-मंगलों में सदा सुख पावेंगे॥
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का छन्द, दोहा १०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।
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शिवजी का विवाह