प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला

दोहा १०७ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम। जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम॥ १०७ ॥

अर्थ

हे प्रभो! आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं। सब कलाओं और गुणों के निधान हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्य के भण्डार हैं। आपका नाम शरणागतों के लिये कल्पवृक्ष है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का दोहा १०७ है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।

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शिवजी का विवाह