पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना
चौपाई ४, दोहा १०२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना॥ सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥ ४ ॥
अर्थ
मैना बार-बार मिलती हैं और पार्वती के चरणों को पकड़कर गिर पड़ती हैं। बड़ा ही प्रेम है, कुछ वर्णन नहीं किया जाता। भवानी सब स्त्रियों से मिल-भेंटकर फिर अपनी माता के हृदय से जा लिपटीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।
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शिवजी का विवाह