त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया
चौपाई २, दोहा १०६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥ एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥ २ ॥
अर्थ
वहाँ तीनों प्रकार की (शीतल, मंद और सुगन्ध) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है। वह शिवजी के विश्राम करने का वृक्ष है, जिसे वेदों ने गाया है। एक बार प्रभु श्रीशिवजी उस वृक्ष के नीचे गये और उसे देखकर उनके हृदय में बहुत आनन्द हुआ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।
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शिवजी का विवाह