सारद दारुनारि सम स्वामी

चौपाई ३, दोहा १०५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी॥ जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥ ३ ॥

अर्थ

सरस्वतीजी कठपुतली के समान हैं और अन्तर्यामी स्वामी श्रीरामचन्द्रजी [सूत पकड़कर कठपुतली को नचानेवाले] सूत्रधार हैं। अपना भक्त जानकर जिस कवि पर वे कृपा करते हैं, उसके हृदयरूपी आँगन में सरस्वती को वे नचाया करते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।

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शिवजी का विवाह