मैं जाना तुम्हार गुन सीला

चौपाई १, दोहा १०५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला॥ सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें॥ १ ॥

अर्थ

मैंने तुम्हारा गुण और शील जान लिया। अब मैं श्रीरघुनाथजी की लीला कहता हूँ, सुनो। हे मुनि! सुनो, आज तुम्हारे मिलने से मेरे मन में जो आनन्द हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।

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शिवजी का विवाह