दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर

छन्द, दोहा १०१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो। का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥ सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो। पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥

अर्थ

बहुत प्रकार का दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचल ने कहा-हे शंकर ! आप पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? [इतना कहकर] वे शिवजी के चरणकमल पकड़कर रह गये। तब कृपा के सागर शिवजी ने अपने ससुर का सभी प्रकार से समाधान किया। फिर प्रेम से परिपूर्ण हृदय मैना जी ने शिवजी के चरणकमल पकड़े [और कहा--]॥

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का छन्द, दोहा १०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।

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शिवजी का विवाह