जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस
छन्द, दोहा १०२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं। फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं॥ जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले। सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥
अर्थ
पार्वतीजी माता से फिर मिलकर चलीं, सब किसी ने उन्हें उचित आशीर्वाद दिये। पार्वतीजी फिर-फिर कर माता की ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिवजी के पास ले गयीं। महादेवजी सब याचकों को सन्तुष्ट कर पार्वती के साथ घर (कैलास) को चले। सब देवता प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा करने लगे और आकाश में सुन्दर नगाड़े बजने लगे॥
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का छन्द, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।
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शिवजी का विवाह