सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं
चौपाई ३, दोहा १०४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥ बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥ ३ ॥
अर्थ
शिवजी के चरणकमलों में जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्रीरामचन्द्रजी को स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ श्रीशिवजी के चरणों में निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्त का लक्षण है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।
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शिवजी का विवाह