नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी
नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी
दोहा १०१ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु। छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥ १०१ ॥
अर्थ
हे नाथ! यह उमा मुझे मेरे प्राणों के समान [प्यारी] है। आप इसे अपने घर की टहलनी बनाइयेगा और इसके सब अपराधों को क्षमा करते रहियेगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का दोहा १०१ है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।
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शिवजी का विवाह