निज कर डासि नागरिपु छाला

चौपाई ३, दोहा १०६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला॥ कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा॥ ३ ॥

अर्थ

अपने हाथ से बाघम्बर बिछाकर कृपालु शिवजी स्वभाव से ही (बिना किसी खास प्रयोजन के) वहाँ बैठ गये। कुन्द के पुष्प, चन्द्रमा और शंख के समान उनका गौर शरीर था। बड़ी लंबी भुजाएँ थीं और वे मुनियों के-से (बल्कल) वस्त्र धारण किये हुए थे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।

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शिवजी का विवाह