कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं

चौपाई ३, दोहा १०२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥ भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥ ३ ॥

अर्थ

किस विधि से जगत् में स्त्री को रचा गया? पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। यह कहते हुए माता प्रेम में अत्यन्त विकल हो गयीं, परन्तु कुसमय जानकर धीरज धरा।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
शिवजी का विवाह