प्रेम बिबस मुख आव न बानी

चौपाई २, दोहा १०४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥ अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥ २ ॥

अर्थ

वे प्रेम में मुग्ध हो गये, मुख से वाणी नहीं निकलती। उनकी यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि याज्ञवल्क्य बहुत प्रसन्न हुए [और बोले--] हे मुनीश! अहा हा! तुम्हारा जन्म धन्य है; तुमको गौरीपति शिवजी प्राणों के समान प्रिय हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।

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शिवजी का विवाह