हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं
चौपाई १, दोहा १०६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं॥ तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला॥ १ ॥
अर्थ
जो भगवान् विष्णु और महादेवजी से विमुख हैं और जिनकी धर्म में प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्न में भी वहाँ नहीं जा सकते। उस पर्वत पर एक विशाल बरगद का पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल (छहों ऋतुओं) में सुन्दर रहता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिवजी का विवाह” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और समस्त लोकों में उत्सव का वर्णन है।
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शिवजी का विवाह