सुंदरता कहुँ सुंदर करई
सुंदरता कहुँ सुंदर करई
चौपाई ४, दोहा २३० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥ सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥ ४ ॥
अर्थ
वह (सीताजी की शोभा) सुन्दरता को भी सुन्दर करनेवाली है [वह ऐसी मालूम होती है] मानो सुन्दरतारूपी घर में दीपक की लौ जल रही हो। सारी उपमाओं को तो कवियों ने जूँठा कर रखा है। मैं जनकनन्दिनी श्रीसीताजी की किससे उपमा दूँ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पुष्पवाटिका में श्रीसीताराम का परस्पर प्रथम दर्शन और मिलन का वर्णन है।
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पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन