जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन
चौपाई ४, दोहा २३१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥ मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥ ४ ॥
अर्थ
रण में शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात् जो लड़ाई के मैदान से भागते नहीं), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टि को नहीं खींच पातीं, और माँगने वाले जिनके यहाँ 'नहीं' नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में थोड़े हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पुष्पवाटिका में श्रीसीताराम का परस्पर प्रथम दर्शन और मिलन का वर्णन है।
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पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन