गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी
चौपाई ४, दोहा २३४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥ धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥ ४ ॥
अर्थ
सखी की यह गूढ़ वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं। देर हो गयी जान उन्हें मातु का भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में ले आयीं, और अपने को पितु वश जानकर लौट चलीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पुष्पवाटिका में श्रीसीताराम का परस्पर प्रथम दर्शन और मिलन का वर्णन है।
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पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन