लोचन मग रामहि उर आनी

चौपाई ४, दोहा २३२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥ जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥ ४ ॥

अर्थ

नेत्रों के रास्ते श्रीरामजी को हृदय में लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजी ने पलकों के किवाड़ लगा दिये (अर्थात् नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियों ने सीताजी को प्रेम के वश जाना, तब वे मन में सकुचा गयीं; कुछ कह नहीं सकती थीं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पुष्पवाटिका में श्रीसीताराम का परस्पर प्रथम दर्शन और मिलन का वर्णन है।

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पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन