भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए

चौपाई २, दोहा २३३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥ बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥ २ ॥

अर्थ

माथे पर तिलक और पसीने की बूँदें शोभायमान हैं। कानों में सुन्दर भूषणों की छबि छायी है। टेढ़ी भौंहें और घुँघराले बाल हैं। नये लाल कमल के समान रतनारे नेत्र हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पुष्पवाटिका में श्रीसीताराम का परस्पर प्रथम दर्शन और मिलन का वर्णन है।

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पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन