तात जनकतनया यह सोई
तात जनकतनया यह सोई
चौपाई १, दोहा २३१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥ पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं॥ १ ॥
अर्थ
हे तात! यह वही जनकजी की कन्या है जिसके लिये धनुषयज्ञ हो रहा है। सखियाँ इसे गौरीपूजन के लिये ले आयी हैं। यह फुलवाड़ी में प्रकाश करती हुई फिर रही है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में पुष्पवाटिका में श्रीसीताराम का परस्पर प्रथम दर्शन और मिलन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
पुष्पवाटिका में सीताराम का मिलन